ऊपर शिखर पर चमकते कंगूरे
जो दिखाई देते हैं भवन की शोभा
बुनियाद के जिन पत्थरों पर खड़े हैं
न उन पर बोझ हैं
पर अब तो उनको कुचलने में ही लग गये हैं
जी मे आता है कि चढ़कर ऊपर
ध्वस्त कर दिये जायें वे कंगूरे
लेकिन सोचता हूँ क्यों नाहक
किया जाये इतना भी श्रम
वे इतने तो नासमझ हैं
नहीं जानते कि जब
कुचल कर भरभरा जायेगी बुनियाद
तो वे भी नहीं बचेंगे
Thursday, 2 December 2010
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