पल प्रतिपल
हर पल
बूँद से सागर
कालचक्र के भीतर
और बाहर
जीवन का कण कण
तन मन प्राण
बनाता मिटाता
उठाता गिराता
यह ज्वार
यह प्लवन
यह दुर्निवार बाढ़
फ़िर भी
यह जीवन अतृप्त
अनादि से अब तक
और और की दौड़
कैसी यह प्यास
कैसा विधाता
Showing posts with label कालचक्र प्यास जीवन बाढ़. Show all posts
Showing posts with label कालचक्र प्यास जीवन बाढ़. Show all posts
Monday, 23 November 2009
Subscribe to:
Posts (Atom)
