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Monday, 2 November 2009

गुलाब बनाम गेहूँ

लाल रंग मे डूबकर
मै दॊड़ा कि
कोई चित्र बन जाऊँ
लाठी लिये
लोगों की भीड़
मेरे सामने हर सड़क पर
चीखती हुई कि
ये नहीं हो सकता
मैने ढेर सारे
हरे कपड़ों को
हवा मे लहराना
शुरू ही किया था कि
टिड्डों के झुन्ड के झुन्ड
ऒर फ़िर सब सफ़ाचट
बहुत बड़ॆ डब्बे में
पीले फ़ूलों की महक
बन्द करके ले गया
दूर जंगल के पास
खुशबुओं के पेड़ लगाने
जंगली सुवरों ने सब
तोड़ फ़ोड़ डाला
सफ़ेद ऒर काले का भी
ऐसा ही बुरा हाल हुआ
खुद को जलाके राख किया
कि चलो सलेटी से ही कुछ काम बने
मगर नहीं
तब फ़िर
पानी बरसाया
सूरज को लाया
ऒर बनाया आसमान मे
एक सतरंगी इन्द्रधनुष
अब सब ठीक था
आज की इस दुनिया मे
जो खुश ऒर व्यस्त है
एक खाली पर्दे पर
आती जाती तस्वीरों
को देखने में
नहीं चाहिये किसी को
सचमुच के रंग