यहाँ से गुजरती ये सड़क
कहाँ मिल जाती है बादलों में
या चुक जाती है
दूर खड़ी उन इमारतों मे से किसी मे
कुछ पता नहीं चलता अँधेरे में
हरे और पीले पत्ते
दिखाई देते हैं एक से
पता नहीं चलता कि
वो सो गया है भरे पेट
या कि पीठ से लगाये पसलियों को
दोस्त और दुश्मन
अमीर और गरीब
कोई भेद नहीं
समा गईं है सब बनावटे
एक दूसरे में
मिट गईं हैं सीमायें
सुन्दर और कुरूप सब एक
जी भर के नज़ारा कर लें आओ
इस खास मंज़र का
इससे पहले कि रोशनी हो और
लौट चलें हम फ़िर
भेदभाव भरी दुनिया में
उजाले की दुनिया में
Showing posts with label Poem Hindi हिन्दी कविता अन्धेरा. Show all posts
Showing posts with label Poem Hindi हिन्दी कविता अन्धेरा. Show all posts
Monday, 21 December 2009
Subscribe to:
Posts (Atom)
