मै एक चिन्तक हूँ
बड़ा चिन्तक
जीवन की
बड़ी बड़ी बातों
समस्याओं और रहस्यों पर
विचार करने का है जिम्मा
मुझे करनी होती हैं
बड़ी संगोष्ठियाँ
पी डालता हूँ दो किताब भर
उलट देता हूँ चार किताब भर
गाहे बगाहे
मार देता हूँ बड़े बड़े जुमले
वक्त बेवक्त
क्या करना मुझे
अगर
कुपोषित हैं बच्चे
अशिक्षित हैं लोग
कोई मतलब नहीं मुझे
अगर सुरक्षित नहीं हैं औरतें
क्या करूँ मै
अगर भूखों मरते हैं किसान
बिना इलाज के दम तोड़ते
गरीब लाचार अपाहिज बूढे
ये समाज के चिथड़े और कोढ़
कीड़ों की तरह नालियों में
जीते रहने को अभिशापित
इस तरफ़ को देखना हो
तो कुछ करना पड़ेगा
बहुत कुछ करना पड़ेगा
इसीलिये
मै एक बड़ा चिन्तक हूँ
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Wednesday, 30 December 2009
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