सब्ज़ी काटते काटते वह उठा
छुरा भोंक दिया उस लड़के के
जिसने घंटी बजाई थी
और जो टोपी पहने था
खून की नदी संसद भवन तक पहुँची
अखबार के दफ़्तर से होकर
पत्रकारों ने स्नान किया आरती की
और भोज की तैयारी में जुट गये
दो गुटों में बँटकर नेताओं ने
मंत्रोच्चार के साथ
एक दूसरे पर फ़ूलों की वर्षा की
बच्चों की छुट्टी हो गई
औरतें खाली और बेपरवाह
कोई ठेलेवाला नहीं गुज़रा कहीं से
बीमार बूढा रात्रि भोजन में
सब्ज़ी न होने से नाराज़ था
और उसने अस्पताल में अनशन कर दिया
नुक्क्ड़ों चौराहों पर
कटी हुई गाजर और मूलियाँ
दुर्गन्ध पैदा करती रहीं
बहुत सी सब्ज़ियाँ कटीं बेमौसम
बहुत से लोग तुरन्त बूढे होकर
भरती हो गये अस्पताल में
यहाँ से बाद में कुछ सीधे स्वर्ग गये
और कुछ घर होकर
किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ा
कईयों ने कहा कि वे प्रभावित हुये
उन्हे भी कोई फ़र्क नहीं पड़ा
फ़र्क ही तो नहीं पड़ता है किसी को कभी भी
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Monday, 22 February 2010
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