मै बाती सा जलकर भी
पथ दीप्त प्रभु कर पाऊँ
खींच उषा का आँचल मैं
नभ पर दिनकर ला पाऊँ
सुख आये या दुख आये
सम हो जीवन का स्वर
हो छाँव या कि धूप हो
बैठूँ नहीं थक हार कर
टूटती हो तार वीणा की
मगर न कभी लय टूटे
छूटते हों राग जीवन के
मगर न कभी आशा छूटे
घृणा द्वेष से दूर रहूँ मै
गीत प्रेम के गा पाऊँ
कुचला जाता भी यदि हूँ
गन्ध पुष्प सी बिखराऊँ
मै बाती सा जलकर भी
पथ दीप्त प्रभु कर पाऊँ
खींच उषा का आँचल मैं
नभ पर दिनकर ला पाऊँ
नव वर्ष पर असीम मंगल कामनाएं !
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Friday, 1 January 2010
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