मैं !
लगाते थे
चक्कर जिसके
चाँद और सूरज
जिसको सुलाने
आती थीं
चाँदनी रातें
जिसके लिए
बहती थीं नदियाँ
गिरते थे झरने
उगते थे पेड़
खिलते थे फूल
गातें थे पंछी
बहती थीं हवाएं
लगते थे मेले
सुख देने को
दुःख देने को
और
कुछ न लेने-देने को
लगे रहते थे लोग
अब जब
सिर्फ़ एक मुट्ठी खाक हूँ
कहूँ तुमसे
कि क्या है हक़ीकत
तो क्यों कहूँ
कैसे कहूँ
देख सको
तो देख लो खुद
Showing posts with label Poem Hindi हिन्दी कविता मै मेरा अहंकार. Show all posts
Showing posts with label Poem Hindi हिन्दी कविता मै मेरा अहंकार. Show all posts
Saturday, 19 December 2009
Subscribe to:
Posts (Atom)
