गुलाब गुलाब है
और जुही जुही
जुही होना चाहे गुलाब यदि
तो पड़ेगी मुश्किल मे
और गुलाब तो खैर हो न पायेगी
यकीनन नही चाहती
कोई चम्पा
किसी जुही या गुलाब के जैसा होना
और क्या पड़ी है किसी गुलाब को
जो वो रजनीगन्धा होने के ख्वाब देखे
कमल खुश है कीचड़ मे ही
गुलाब को नहीं है शिकायत काटों से
काँटे इतराते नहीं
फ़ूलों का साथ होने से
हम जो हैं
वही होने को हैं
अनुकरण मात्र ही
अन्धानुकरण है
लाख हो आसान
कोई बनी बनाई राह
ले न जा सकेगी मंजिल तक
कभी न ले गई किसी को
राह खुद अपनी बनानी है हमें
साफ़ कर झाड़ियां काटें पगडन्डियों के
तोड़ने हैं पत्थर खुद ही
बिछानी है रोड़ियाँ
फ़िर इस सड़क पर है चलना हमें
और फ़िर मुमकिन है कि
पहुँच सकें वहाँ
स्वयं मे
स्वयं के होके जीना ही
सफ़लता है मंजिल है
बस यही कि स्वयं की पूर्णता में
हम फ़लें फ़ूलें
स्वीकार करके जो हैं जैसे हैं
स्वयं के शिखर छूलें
बुलन्दी है यही
ज़िन्दगी है यही
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Saturday, 26 December 2009
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