रोती रही रात भर
ताज से लिपट के
बहती हुई गुम हो गई
घने कोहरे मे
पंखुडियों पे जम के बैठ रही
उसकी सिसकियां
गूंजती रहीं सदियों महलों मे
आसुँओ को बिखेर एक चितेरे ने
सजा डाले बगीचे
डोंगी मे बैठ यमुना पर
चाँदनी पीने की आस लिये
ज़िन्दगी पा लेने की
ज़िन्दगी भर की नाकाम कोशिश
एक निहायत खूबसूरत इमारत
सदियों सदियों के लिये
मोहब्बत करने वालों के लिये रश्क
न कर पाने वालों के लिये रश्क
रोती रहती है रात भर
आज भी एक रूह
लिपट के ताज से
सूकून नहीं है
जाने क्यों
Sunday, 31 January 2010
Saturday, 30 January 2010
पत्थर की मूर्तियाँ
मूर्तियाँ बनवाने से
नहीं होता कोई महान
कोई होता है जब महान
तो बन ही जाती हैं मूर्तियाँ
पत्थर की बनी हुई
नहीं टिकतीं ज्यादा देर
धरासाई कर देता है कभी
कोई भूकम्प
कोई गुस्साई भीड़
किसी नेता की सनक
नगर निगम की नई योजना
महान लोगों की मूर्तियाँ
ज़िन्दा रहती हैं
यहाँ भीतर
दिलों में
नहीं होता कोई महान
कोई होता है जब महान
तो बन ही जाती हैं मूर्तियाँ
पत्थर की बनी हुई
नहीं टिकतीं ज्यादा देर
धरासाई कर देता है कभी
कोई भूकम्प
कोई गुस्साई भीड़
किसी नेता की सनक
नगर निगम की नई योजना
महान लोगों की मूर्तियाँ
ज़िन्दा रहती हैं
यहाँ भीतर
दिलों में
Friday, 29 January 2010
सम्बन्ध
रात दिखता था घर के बाहर
घना कोहरा
इतना कि नहीं दिखता था
सामने वाला घर
सोचता हूँ
वो कौन सा कोहरा है
सरक आया है जो भीतर घर के
नहीं दिखते साफ़
साथ रहने वाले शख्स
कहाँ देख पाते हैं साफ़ हम
बरसों साथ रहके भी
एक दूसरे को
क्या है हमारे बीच कोहरा सा
जो दिखता नहीं
देखने देता नहीं
वो मैं है शायद
दो मैं
एक मेरा एक तुम्हारा
दो अहम
ठोस
सोचना ये है कि
हमारे बीच वो ऊष्मा कहाँ से आये
जो वाष्पीभूत कर दे
बीच के कोहरे को
शायद प्रेम है वो गर्मी
घना कोहरा
इतना कि नहीं दिखता था
सामने वाला घर
सोचता हूँ
वो कौन सा कोहरा है
सरक आया है जो भीतर घर के
नहीं दिखते साफ़
साथ रहने वाले शख्स
कहाँ देख पाते हैं साफ़ हम
बरसों साथ रहके भी
एक दूसरे को
क्या है हमारे बीच कोहरा सा
जो दिखता नहीं
देखने देता नहीं
वो मैं है शायद
दो मैं
एक मेरा एक तुम्हारा
दो अहम
ठोस
सोचना ये है कि
हमारे बीच वो ऊष्मा कहाँ से आये
जो वाष्पीभूत कर दे
बीच के कोहरे को
शायद प्रेम है वो गर्मी
Thursday, 28 January 2010
एक खबर
दो चींटियों की हो रही थी शादी
चल रहा था प्रीतिभोज
सजे धजे लोग
गीत संगीत
हँसी और छेड़छाड़
झूलों पर बच्चों की भीड़
शराब की मस्ती से सराबोर नौजवान
गुब्बारे बेचती चींटियाँ
कुछ मिल जाने की लालसा में
व्यग्र भिखारी चींटियाँ
जिस लॉन पर बसी थी ये खुशनुमा दुनिया
उसके नजदीक बरामदे में खेलता
एक छह माह का दुधमुँहा बच्चा
ठोकर मार एक बड़ी गेंद को
देता है उछाल फ़ेंक और वो
जा गिरती है उस जलसे पर
न जाने कितने मृत
न जाने कितने घायल
न जाने कितने का नुकसान
पता नहीं क्या लिखेंगे अखबार वाले
पता नहीं क्या दिखायेंगे टीवी वाले
उस दुधमुँहे बच्चे को सचमुच
कुछ पता नहीं
चल रहा था प्रीतिभोज
सजे धजे लोग
गीत संगीत
हँसी और छेड़छाड़
झूलों पर बच्चों की भीड़
शराब की मस्ती से सराबोर नौजवान
गुब्बारे बेचती चींटियाँ
कुछ मिल जाने की लालसा में
व्यग्र भिखारी चींटियाँ
जिस लॉन पर बसी थी ये खुशनुमा दुनिया
उसके नजदीक बरामदे में खेलता
एक छह माह का दुधमुँहा बच्चा
ठोकर मार एक बड़ी गेंद को
देता है उछाल फ़ेंक और वो
जा गिरती है उस जलसे पर
न जाने कितने मृत
न जाने कितने घायल
न जाने कितने का नुकसान
पता नहीं क्या लिखेंगे अखबार वाले
पता नहीं क्या दिखायेंगे टीवी वाले
उस दुधमुँहे बच्चे को सचमुच
कुछ पता नहीं
Wednesday, 27 January 2010
किस्मत
मेरी किस्मत मे लिख दो
एक टुकड़ा चाँदनी
अँधियारी रातों को
लिख दो अलसाये फ़ागुन के दिन
कुछ सपने सतरंगे
मीठी नींद ज़रा सी
रुनझुन पायल चूड़ी खनखन
थोड़े से झूले सावन के
सुबह के हवा की खुशबू
चटकीले बादल के रंग
पहली बारिश का सोंधापन
आग बरसते आसमान में
पल भर छाया शीतल लिख दो
ठिठुरते दिनो मे लिख दो
आँगन भर भर धूप
प्रियतम एक मधुमास लिख दो मेरे नाम
मन मंदिर में अपने लिख दो मेरा नाम
एक टुकड़ा चाँदनी
अँधियारी रातों को
लिख दो अलसाये फ़ागुन के दिन
कुछ सपने सतरंगे
मीठी नींद ज़रा सी
रुनझुन पायल चूड़ी खनखन
थोड़े से झूले सावन के
सुबह के हवा की खुशबू
चटकीले बादल के रंग
पहली बारिश का सोंधापन
आग बरसते आसमान में
पल भर छाया शीतल लिख दो
ठिठुरते दिनो मे लिख दो
आँगन भर भर धूप
प्रियतम एक मधुमास लिख दो मेरे नाम
मन मंदिर में अपने लिख दो मेरा नाम
Tuesday, 26 January 2010
जश्ने क़ैद
हम कैद मे हैं
हमेशा से कैद हैं हम
कारागृह हमारी नियति
जंजीरे हमारा भाग्य
ऊब गये एक जेल से तो दूसरी
ये नहीं तो वो जंजीर
जैसे रात सोते कोई करवट बदले
जंजीरे बदल जाती हैं
कैद जारी रहती है
हर क्रान्ति बदल डालती है जेलें
और बदल जाते हैं जेलर
आज़ादी की हर लड़ाई का परिणाम
तमाम भावुक लोगों की मौत
कुछेक चालाक लोगों के हाथ मे सत्ता
आम लोगों की हालत वही की वही
बल्कि अक्सर और बदतर
पहले हुआ करती थीं बहुत खूँरेज़
सत्ता बदलने की लड़ाइयाँ
हम अब ज़रा सभ्य हो गये
करते हैं हर पाँच साल में
और जल्दी भी कभी
बड़ी सी एक बेकार की कवायद
एक ही थैली के चट्टे बट्टे
मजे ले लेकर
बारी बारी से
करते हैं राज
पहले के लोगों से ज्यादा शातिर
ज्यादा होशियार ठहरे
राज़ी कर लिया है हमें
कि हम खुशी खुशी अपने ही हाथों
कुबूल करें
कभी इसकी हथकड़ी
तो कभी उसकी
कभी ये जेल तो कभी वो
बहरहाल कैद ज़ारी है बदस्तूर
और हाँ
इन खतरनाक और चालाक लोगों ने
चीजों की शक्ल बदल दी है
जेलों को अबके बनाया है महलनुमा
ज़ंजीरों को ज़ेवरात की शक्ल दी है
हमेशा से कैद हैं हम
कारागृह हमारी नियति
जंजीरे हमारा भाग्य
ऊब गये एक जेल से तो दूसरी
ये नहीं तो वो जंजीर
जैसे रात सोते कोई करवट बदले
जंजीरे बदल जाती हैं
कैद जारी रहती है
हर क्रान्ति बदल डालती है जेलें
और बदल जाते हैं जेलर
आज़ादी की हर लड़ाई का परिणाम
तमाम भावुक लोगों की मौत
कुछेक चालाक लोगों के हाथ मे सत्ता
आम लोगों की हालत वही की वही
बल्कि अक्सर और बदतर
पहले हुआ करती थीं बहुत खूँरेज़
सत्ता बदलने की लड़ाइयाँ
हम अब ज़रा सभ्य हो गये
करते हैं हर पाँच साल में
और जल्दी भी कभी
बड़ी सी एक बेकार की कवायद
एक ही थैली के चट्टे बट्टे
मजे ले लेकर
बारी बारी से
करते हैं राज
पहले के लोगों से ज्यादा शातिर
ज्यादा होशियार ठहरे
राज़ी कर लिया है हमें
कि हम खुशी खुशी अपने ही हाथों
कुबूल करें
कभी इसकी हथकड़ी
तो कभी उसकी
कभी ये जेल तो कभी वो
बहरहाल कैद ज़ारी है बदस्तूर
और हाँ
इन खतरनाक और चालाक लोगों ने
चीजों की शक्ल बदल दी है
जेलों को अबके बनाया है महलनुमा
ज़ंजीरों को ज़ेवरात की शक्ल दी है
Monday, 25 January 2010
शाम
सुबह आँख खोलते ही
सामने खड़े हो जाते हैं मुँह बाये
बहुत से काम
थोड़े वादे
कुछेक मुलाकातें
ढेर सी भाग दौड़
काटना ही तो कहेंगे इसे
जबरन चलती रहती है
उठापटक दिन भर
सारा दिन बुलाती रहती है शाम हमें
कुछ है जो खींचता सा है
कुछ है जो दिखता है आगे
जिसे काटना न पड़ेगा
और जो कट जायेगा तो
अच्छा न लगेगा
फ़िर हो ही जाती है शाम
और फ़िर कुछ नहीं होता
बेवफ़ा सी मालूम होती है शाम हमें
अभी जब लगता है
दोपहर ही है ज़िन्दगी में
होगी कभी शाम भी
सोचता हूँ क्या वह भी
निकलेगी बेवफ़ा
सामने खड़े हो जाते हैं मुँह बाये
बहुत से काम
थोड़े वादे
कुछेक मुलाकातें
ढेर सी भाग दौड़
काटना ही तो कहेंगे इसे
जबरन चलती रहती है
उठापटक दिन भर
सारा दिन बुलाती रहती है शाम हमें
कुछ है जो खींचता सा है
कुछ है जो दिखता है आगे
जिसे काटना न पड़ेगा
और जो कट जायेगा तो
अच्छा न लगेगा
फ़िर हो ही जाती है शाम
और फ़िर कुछ नहीं होता
बेवफ़ा सी मालूम होती है शाम हमें
अभी जब लगता है
दोपहर ही है ज़िन्दगी में
होगी कभी शाम भी
सोचता हूँ क्या वह भी
निकलेगी बेवफ़ा
Sunday, 24 January 2010
झूठ
जवाब दिया था जब मैने
कि नहीं करूँगा
इस सवाल पर तुम्हारे
कि कुछ करोगे तो नहीं
जो उठा था
मेरे बार बार आग्रह से बुलाने पर
एकान्त मे तुम्हे
उस वक्त
झूठ बोल रहा था मैं
ये मै भी जानता था
तुम भी
कि नहीं करूँगा
इस सवाल पर तुम्हारे
कि कुछ करोगे तो नहीं
जो उठा था
मेरे बार बार आग्रह से बुलाने पर
एकान्त मे तुम्हे
उस वक्त
झूठ बोल रहा था मैं
ये मै भी जानता था
तुम भी
Saturday, 23 January 2010
कुछ तो यूँही यहाँ जीना आसान न था
और फ़िर तूभी तो मुझपे मेहरबान न था
महज़ दो ही परेशानियाँ इश्क में हुईं हमें
चैन दिन को नहीं रात को आराम न था
मीर का दिलबर दर्द का चारा जाने था
अपना भी मगर कोई ऐसा नादान न था
झूठ नहीं फ़रेब नहीं दगा नहीं न मक्कारी
पास मेरे तो कोई जीने का सामान न था
पाँव टूटने का हमे गिला होता क्योंकर
अफ़सोस उस गली में मेरा मकान न था
और फ़िर तूभी तो मुझपे मेहरबान न था
महज़ दो ही परेशानियाँ इश्क में हुईं हमें
चैन दिन को नहीं रात को आराम न था
मीर का दिलबर दर्द का चारा जाने था
अपना भी मगर कोई ऐसा नादान न था
झूठ नहीं फ़रेब नहीं दगा नहीं न मक्कारी
पास मेरे तो कोई जीने का सामान न था
पाँव टूटने का हमे गिला होता क्योंकर
अफ़सोस उस गली में मेरा मकान न था
Friday, 22 January 2010
संगम
बूँद बूँद पिघलती है बर्फ़
सँकरे मुहाने से निकलती है
चट्टानों को काटती है
झाड़ियों में बनाती है राह
आड़े तिरछे पहाड़ के
दुर्गम रास्ते पे जूझती है
न कोई दिशा सूचक होता है
न कोई नक्शा
मार्ग बताने वाला भी नहीं कोई
भटकती फ़िरती है
और कहाँ कहाँ मारती है सर
आबादियों के पास से गुजरती है
ढोती है लोगों की गन्दगी
हर तरह की
बरबादियों से लड़्ती है
कुदरत से खाती है मार
सूख कर भी नहीं मानती हार
पल भर नही थमती विश्राम को
अदम्य साहस दिखाती है
प्रिय मिलन की आस से भरी
गिरते पड़ते चलती जाती है
अन्तत: एक दिन वो नदी
सागर के सामने
पहूँच ही जाती है
इतराती है दुलराती है
खुश होती है और
चौड़ी हो जाती है
ज़रा सोचो
कि अब अगर सागर मना कर दे
प्रणय को
तो क्या करे वह कहाँ जाये
ऐ मेरे देवता
मेरी प्रार्थना सुनी जाये
सँकरे मुहाने से निकलती है
चट्टानों को काटती है
झाड़ियों में बनाती है राह
आड़े तिरछे पहाड़ के
दुर्गम रास्ते पे जूझती है
न कोई दिशा सूचक होता है
न कोई नक्शा
मार्ग बताने वाला भी नहीं कोई
भटकती फ़िरती है
और कहाँ कहाँ मारती है सर
आबादियों के पास से गुजरती है
ढोती है लोगों की गन्दगी
हर तरह की
बरबादियों से लड़्ती है
कुदरत से खाती है मार
सूख कर भी नहीं मानती हार
पल भर नही थमती विश्राम को
अदम्य साहस दिखाती है
प्रिय मिलन की आस से भरी
गिरते पड़ते चलती जाती है
अन्तत: एक दिन वो नदी
सागर के सामने
पहूँच ही जाती है
इतराती है दुलराती है
खुश होती है और
चौड़ी हो जाती है
ज़रा सोचो
कि अब अगर सागर मना कर दे
प्रणय को
तो क्या करे वह कहाँ जाये
ऐ मेरे देवता
मेरी प्रार्थना सुनी जाये
Thursday, 21 January 2010
मुक्ति
एक दिन झाड़ दूँगा धूल
कर्मो की विचारों की सपनो की
फ़ेंक दूँगा लगाव
किताबों से आमो से खास लोगों से
दरकिनार कर बैठूँगा चिन्तायें
परिवार की समाज की जगत की
छुट्टी पा लूँगा कष्टों से
बीमारी के मौसमो के बेमौसम के
छोड़ दूँगा सब
तरह तरह की शंकायें
हर तरह की आशायें
दोनो जहान के झगड़े
रोज़ रोज़ के लफ़ड़े
खत्म कर दूँगा
आदि अनादि के विवाद
व्यर्थ के संवाद
प्रेम कहानियाँ
दुश्मनी की गालियाँ
सब झंझटों से
मुक्त हो जाऊँगा
बस अपने ही मे
मस्त हो जाऊँगा
न जवाब दूँगा
कोई कुछ भी कहे
लोग कहेंगे
मिश्रा जी नहीं रहे
कर्मो की विचारों की सपनो की
फ़ेंक दूँगा लगाव
किताबों से आमो से खास लोगों से
दरकिनार कर बैठूँगा चिन्तायें
परिवार की समाज की जगत की
छुट्टी पा लूँगा कष्टों से
बीमारी के मौसमो के बेमौसम के
छोड़ दूँगा सब
तरह तरह की शंकायें
हर तरह की आशायें
दोनो जहान के झगड़े
रोज़ रोज़ के लफ़ड़े
खत्म कर दूँगा
आदि अनादि के विवाद
व्यर्थ के संवाद
प्रेम कहानियाँ
दुश्मनी की गालियाँ
सब झंझटों से
मुक्त हो जाऊँगा
बस अपने ही मे
मस्त हो जाऊँगा
न जवाब दूँगा
कोई कुछ भी कहे
लोग कहेंगे
मिश्रा जी नहीं रहे
Wednesday, 20 January 2010
अति
ज्यादा ठण्ड हुई तो मर गये
ज्यादा गर्मी तो भी मरे
कभी ज्यादा बारिश
तो कभी सूखा
कभी ज्यादा हवायें ही मार देती हैं
मै बात कर रहा हूँ जिस प्राणी जगत की
उनमे से अनेकों को मार देती है
ज्यादा भूख भी
आश्चर्य है उन्हे कि
ज्यादा भोजन भी मार सकता है किसी को
ज्यादा गर्मी तो भी मरे
कभी ज्यादा बारिश
तो कभी सूखा
कभी ज्यादा हवायें ही मार देती हैं
मै बात कर रहा हूँ जिस प्राणी जगत की
उनमे से अनेकों को मार देती है
ज्यादा भूख भी
आश्चर्य है उन्हे कि
ज्यादा भोजन भी मार सकता है किसी को
Tuesday, 19 January 2010
Monday, 18 January 2010
पानी गये न ऊबरे
मोती मनुष्य चूना
रहीम के अनुसार
बिना पानी हैं बेकार
होता तो है पानी मनुष्य में
कहावत है कि मर जाता है
इन्सान का पानी कभी कभी
मेरी समझ से मर नहीं सकता पानी
रूप बदल लेता है
पानी जब पानी नहीं रहता
तो हो जाता है बर्फ़ या भाप
बर्फ़ यानि ठोस पत्थर भावना शून्य
भाप यानि गुबार धुँआ मलिन द्रष्टि
मेरी एक आँख तुम
जमी हुई पाओगे
दूसरी में गुबार
एक द्रष्टि निर्मोही
दूसरी अस्पष्ट
हर आँख की यही कथा है
या कहें व्यथा है
रहीम के अनुसार
बिना पानी हैं बेकार
होता तो है पानी मनुष्य में
कहावत है कि मर जाता है
इन्सान का पानी कभी कभी
मेरी समझ से मर नहीं सकता पानी
रूप बदल लेता है
पानी जब पानी नहीं रहता
तो हो जाता है बर्फ़ या भाप
बर्फ़ यानि ठोस पत्थर भावना शून्य
भाप यानि गुबार धुँआ मलिन द्रष्टि
मेरी एक आँख तुम
जमी हुई पाओगे
दूसरी में गुबार
एक द्रष्टि निर्मोही
दूसरी अस्पष्ट
हर आँख की यही कथा है
या कहें व्यथा है
Sunday, 17 January 2010
तत्वमीमांसा
सूरज निकला भी होना चाहिये
सिर्फ़ खिड़कियाँ खोल देने भर से
नहीं आ जाती धूप
खिड़की खुली भी होनी चाहिये
सिर्फ़ सूरज निकले होने भर से
नहीं आ जाती धूप
धूप लाई नहीं जा सकती
लेकिन रोकी जा सकती है धूप
सिर्फ़ खिड़कियाँ खोल देने भर से
नहीं आ जाती धूप
खिड़की खुली भी होनी चाहिये
सिर्फ़ सूरज निकले होने भर से
नहीं आ जाती धूप
धूप लाई नहीं जा सकती
लेकिन रोकी जा सकती है धूप
Saturday, 16 January 2010
बड़ा हुआ तो क्या हुआ
दूर तक फ़ैली रेत
बियाबान बंजर भयावह
भीषण गर्म हवाओं के थपेड़े
आग उगलता सूरज
नामोनिशान तक नहीं बादलों का
सीधा लम्बा खड़ा खजूर का पेड़
छाया नहीं है पंथी को
और न ही फ़ल पास
लेकिन है अदम्य साहस
मुश्किलों मे डटे रहने का संकल्प
जो उनके पास कहाँ
इतराते हैं जो
अपनी फ़लदार शाखाओं
और छायादार पत्तियों पर
बियाबान बंजर भयावह
भीषण गर्म हवाओं के थपेड़े
आग उगलता सूरज
नामोनिशान तक नहीं बादलों का
सीधा लम्बा खड़ा खजूर का पेड़
छाया नहीं है पंथी को
और न ही फ़ल पास
लेकिन है अदम्य साहस
मुश्किलों मे डटे रहने का संकल्प
जो उनके पास कहाँ
इतराते हैं जो
अपनी फ़लदार शाखाओं
और छायादार पत्तियों पर
Friday, 15 January 2010
क्या लागे मेरा
एक होटल के कमरे में
एक सर्द सुबह बैठे बैठे
खिड़की के पार ज़रा दूर
दिखा भीख माँगता बूढ़ा
दिल पसीजा जी किया
दे दूँ ये कम्बल उसको
उठा ही था हाथ मे ले
कि खयाल आया अरे
ये तो मेरा है ही नहीं
न कम्बल न कमरा
लेकिन
वो कमरा जिसे घर कहते हैं
उसमे कम्बल
जिसे अपना समझते हैं
हे ईश्वर !
कब खयाल आयेगा कि
वो भी मेरा नहीं है !
एक सर्द सुबह बैठे बैठे
खिड़की के पार ज़रा दूर
दिखा भीख माँगता बूढ़ा
दिल पसीजा जी किया
दे दूँ ये कम्बल उसको
उठा ही था हाथ मे ले
कि खयाल आया अरे
ये तो मेरा है ही नहीं
न कम्बल न कमरा
लेकिन
वो कमरा जिसे घर कहते हैं
उसमे कम्बल
जिसे अपना समझते हैं
हे ईश्वर !
कब खयाल आयेगा कि
वो भी मेरा नहीं है !
Thursday, 14 January 2010
मकर संक्रान्ति
सर्दी बढ़ गई है
घर से लोग ज़रा कम निकलते हैं
और काफ़ी देर से भी
भगवान भास्कर को भी
लगता है
सुबह सुबह नहा धोकर तैयार होने मे
काफ़ी वक्त लग जाता है निकलते निकलते
कभी कभी तो वो पूरा दिन ही मार लेते हैं छुट्टी
कैज़ुअल लीव
गत सप्ताह तो लगता है
चले गये थे मेडिकल लीव पर
वापस आये तो ज़रा कमजोर थे
अच्छा लेकिन
कुछ लोग वाकई बहुत सख्त हैं
जल्दी से हुये तैयार और लग गये काम पे
ऐसी सर्दी मे भी
बिला नागा
न कोई कैज़ुअल न मेडिकल
कम्बलों और जैकेटों का भी
कम ही सहारा है जिनको
धूप के ही हैं भरोसे जादा
सो भी दगा दे देती है गाहे बगाहे
तमाम हैं ऐसे
जैसे मेरे घर की बाई
दफ़्तर के चपरासी
ईंटे ढोती औरतें
रिक्शा खींचते आदमी
कूड़ा बीनते बच्चे
इन्सान को चाहिये थोड़ी सहूलियत दे दे इनको
जैसे ज़रा देर से आने की मोहलत
कोई पुराना कम्बल
पानी गरम करने की सुविधा
बच्चों का पुराना स्वेटर
बचा हुआ खाना
लेकिन मै सोचूँ
कि जब भगवान ही दुबक जाते हैं
थोड़ी सी धूप देने में
इनको इस मौसम मे
तो इन्सान की आखिर बिसात ही क्या है
घर से लोग ज़रा कम निकलते हैं
और काफ़ी देर से भी
भगवान भास्कर को भी
लगता है
सुबह सुबह नहा धोकर तैयार होने मे
काफ़ी वक्त लग जाता है निकलते निकलते
कभी कभी तो वो पूरा दिन ही मार लेते हैं छुट्टी
कैज़ुअल लीव
गत सप्ताह तो लगता है
चले गये थे मेडिकल लीव पर
वापस आये तो ज़रा कमजोर थे
अच्छा लेकिन
कुछ लोग वाकई बहुत सख्त हैं
जल्दी से हुये तैयार और लग गये काम पे
ऐसी सर्दी मे भी
बिला नागा
न कोई कैज़ुअल न मेडिकल
कम्बलों और जैकेटों का भी
कम ही सहारा है जिनको
धूप के ही हैं भरोसे जादा
सो भी दगा दे देती है गाहे बगाहे
तमाम हैं ऐसे
जैसे मेरे घर की बाई
दफ़्तर के चपरासी
ईंटे ढोती औरतें
रिक्शा खींचते आदमी
कूड़ा बीनते बच्चे
इन्सान को चाहिये थोड़ी सहूलियत दे दे इनको
जैसे ज़रा देर से आने की मोहलत
कोई पुराना कम्बल
पानी गरम करने की सुविधा
बच्चों का पुराना स्वेटर
बचा हुआ खाना
लेकिन मै सोचूँ
कि जब भगवान ही दुबक जाते हैं
थोड़ी सी धूप देने में
इनको इस मौसम मे
तो इन्सान की आखिर बिसात ही क्या है
Wednesday, 13 January 2010
एक छोटा सवाल
देखो मुझसे पूछ के तो यहाँ भेजा नहीं गया
जाते समय भी नहीं पूछी जायेगी मेरी मर्ज़ी
यहाँ रहते भी अगर न हो मेरी मर्ज़ी का तो
मेरा सवाल है
फ़िर आखिर कहाँ हो कुछ भी मेरी मर्ज़ी से
किससे पूछूँ मै ये सवाल
जाते समय भी नहीं पूछी जायेगी मेरी मर्ज़ी
यहाँ रहते भी अगर न हो मेरी मर्ज़ी का तो
मेरा सवाल है
फ़िर आखिर कहाँ हो कुछ भी मेरी मर्ज़ी से
किससे पूछूँ मै ये सवाल
Tuesday, 12 January 2010
अर्थ काम धर्म मोक्ष
किताबों और इम्तिहानों के
जंगल में उलझकर जब पहली बार
जीवन में कष्ट समझ मे आया
ये बताया गया कि
इसके पार परम सुख है
लेकिन उसके पार जब
जीविकोपार्जन और
अन्य युवा सुलभ आकांक्षाओं
की उहापोह के झमेलों में
फ़िर जान अटकी सी जान पड़ी
ये बताया गया कि
इसके पार परम सुख है
फ़िर एक बार झटका लगा
जब जीवन में अर्थ सिर्फ़ अर्थोपार्जन में दिखा
और काम हमेशा काम में रोड़ा रहा
अब सिवाय ये स्वयं मान लेने के
कोई चारा नहीं था कि
इसके पार परम सुख है
अर्थ का
जीवन अनर्थ कर देना
समझ नहीं आया कभी
ये भी न समझ आया कि
काम है एक दुश्पूर माँग
एक बिना पेंदे का बरतन
डाले रहो हमेशा जिसमे
खैर
परम सुख अब जब कि
जान पड़ता है केवल मृग मरीचिका
एक नया झमेला शुरु हुआ
धर्म का
और उसके नाम पर चल रहे
सब तरह के अधर्म का
अब लालच दिया जा रहा है
मोक्ष का
अब जब कि पक्का जान पड़ता है
कि परम सुख
एक परम कुटिल जालसाजी है
हम भी हो गये शिकार
जंगल में उलझकर जब पहली बार
जीवन में कष्ट समझ मे आया
ये बताया गया कि
इसके पार परम सुख है
लेकिन उसके पार जब
जीविकोपार्जन और
अन्य युवा सुलभ आकांक्षाओं
की उहापोह के झमेलों में
फ़िर जान अटकी सी जान पड़ी
ये बताया गया कि
इसके पार परम सुख है
फ़िर एक बार झटका लगा
जब जीवन में अर्थ सिर्फ़ अर्थोपार्जन में दिखा
और काम हमेशा काम में रोड़ा रहा
अब सिवाय ये स्वयं मान लेने के
कोई चारा नहीं था कि
इसके पार परम सुख है
अर्थ का
जीवन अनर्थ कर देना
समझ नहीं आया कभी
ये भी न समझ आया कि
काम है एक दुश्पूर माँग
एक बिना पेंदे का बरतन
डाले रहो हमेशा जिसमे
खैर
परम सुख अब जब कि
जान पड़ता है केवल मृग मरीचिका
एक नया झमेला शुरु हुआ
धर्म का
और उसके नाम पर चल रहे
सब तरह के अधर्म का
अब लालच दिया जा रहा है
मोक्ष का
अब जब कि पक्का जान पड़ता है
कि परम सुख
एक परम कुटिल जालसाजी है
हम भी हो गये शिकार
Monday, 11 January 2010
ड्राइवर
बाहर ठण्ड है
सोया हूँ देर तक
देर तक सोया रह सकता हूँ
हो रहा है सब कुछ समय पर विधिवत
जैसे बच्चों का स्कूल जाना
उन्हे ले जायेगा मेरे जैसा ही एक इन्सान
जो सोया नहीं है देर तक
बाहर ठण्ड है फ़िर भी
सोया नहीं रह सकता है देर तक
शायद ये इन्सान उस वक्त सोया हो देर तक
जब मै नहीं सोया था
क्या कोई गणित होता है सोने के वक्त का
पता नहीं
लेकिन मुझे ठीक लग रहा है
इस वक्त देर तक सोना
और उसे शायद न ठीक लग रहा हो
सोया हूँ देर तक
देर तक सोया रह सकता हूँ
हो रहा है सब कुछ समय पर विधिवत
जैसे बच्चों का स्कूल जाना
उन्हे ले जायेगा मेरे जैसा ही एक इन्सान
जो सोया नहीं है देर तक
बाहर ठण्ड है फ़िर भी
सोया नहीं रह सकता है देर तक
शायद ये इन्सान उस वक्त सोया हो देर तक
जब मै नहीं सोया था
क्या कोई गणित होता है सोने के वक्त का
पता नहीं
लेकिन मुझे ठीक लग रहा है
इस वक्त देर तक सोना
और उसे शायद न ठीक लग रहा हो
Sunday, 10 January 2010
द्रष्टिकोण
मरी गाय को
कच्चे माल की तरह देखता है मोची
सम्भावित आमदनी की तरह देखता है पुजारी
भोजन की तरह देखेती हैं चीलें
बोझ की तरह देखते हैं सफ़ाईकर्मी
नुकसान की तरह देखता है ग्वाला
मुझे आँकते वक्त तुम देख सकते हो
मेरे जूते
मेरा चेहरा
मेरी पढ़ी हुई किताबें
मेरा पसन्दीदा भोजन
और भी बहुत कुछ
ये देखना तुम्हारे बाबत खबर देगा बहुत कुछ
मेरी तुम्हे शायद ही कोई खबर मिले
कच्चे माल की तरह देखता है मोची
सम्भावित आमदनी की तरह देखता है पुजारी
भोजन की तरह देखेती हैं चीलें
बोझ की तरह देखते हैं सफ़ाईकर्मी
नुकसान की तरह देखता है ग्वाला
मुझे आँकते वक्त तुम देख सकते हो
मेरे जूते
मेरा चेहरा
मेरी पढ़ी हुई किताबें
मेरा पसन्दीदा भोजन
और भी बहुत कुछ
ये देखना तुम्हारे बाबत खबर देगा बहुत कुछ
मेरी तुम्हे शायद ही कोई खबर मिले
Saturday, 9 January 2010
सिकुड़न
ठण्ड सिकोड़ देती है बहुत कुछ
जैसे चादर
क्योंकि मेरे पाँव तो उतने ही लम्बे हैं
फ़िर भी बाहर हैं
लेकिन कुछ चीजें ठण्ड और गर्मी
दोनो मे ही सिकुड़ जाती हैं
जैसे दिल
क्योंकि ज्यादा लोग मर जाते हैं
जबकि घरों मे तो जगह उतनी ही रहती है
जैसे चादर
क्योंकि मेरे पाँव तो उतने ही लम्बे हैं
फ़िर भी बाहर हैं
लेकिन कुछ चीजें ठण्ड और गर्मी
दोनो मे ही सिकुड़ जाती हैं
जैसे दिल
क्योंकि ज्यादा लोग मर जाते हैं
जबकि घरों मे तो जगह उतनी ही रहती है
Friday, 8 January 2010
कोहरा
पर्यावरण प्रदूषण जन्य
वैश्विक वायुमण्डल तापवृद्धि प्रेरित
दिन भर बाहर छाया कोहरा
दिखता नहीं ठीक से
दिशा भटक जाते हैं
टकराते हैं
मंजिल तक पहुँचने मे बाधा है
अवश्यम्भावी है ये पूर्णतया छट जाये
कुछ सप्ताह उपरान्त
लेकिन
एक और कोहरा
जो छाया है यहाँ भीतर
सदियों से घेरा डाले
नही देखने देता ठीक से
दिशाभ्रम पैदा करता है
मंजिल तक पहुँचने मे बाधा है
अवश्यम्भावी है ये न छटे स्वयं
जन्मो तक भी
वैश्विक वायुमण्डल तापवृद्धि प्रेरित
दिन भर बाहर छाया कोहरा
दिखता नहीं ठीक से
दिशा भटक जाते हैं
टकराते हैं
मंजिल तक पहुँचने मे बाधा है
अवश्यम्भावी है ये पूर्णतया छट जाये
कुछ सप्ताह उपरान्त
लेकिन
एक और कोहरा
जो छाया है यहाँ भीतर
सदियों से घेरा डाले
नही देखने देता ठीक से
दिशाभ्रम पैदा करता है
मंजिल तक पहुँचने मे बाधा है
अवश्यम्भावी है ये न छटे स्वयं
जन्मो तक भी
Thursday, 7 January 2010
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