| उन्होंने कहा |
| यह दैवीय आपदा है |
| और अपने पाप धो लिए |
| इन्होने कहा |
| यह विधि का विधान है |
| और अपने दुर्भाग्य पर रो लिए |
Monday, 1 July 2013
खंड खंड उत्तर
Saturday, 18 May 2013
मीलों हमें जाना है
| अभी तो शुरू किया है सालों हमें खाना है |
| मीलों हम आ गए मीलों हमें जाना है |
| एयर इन्डिया को धूल चटा दी |
| रेल की हमने पेल मचा दी |
| चोर डकैत सब सकते में हैं |
| लूट की ऐसी झड़ी लगा दी |
| हमें जरूरत क्या है दुश्मन मुल्कों की |
| ये देश हमारा है और हमीं को मिटाना है |
| मीलों हम आ गए मीलों हमें जाना है |
| हमने टूजी थ्रीजी खाया |
| कोयला खाया लोहा खाया |
| पीहर से हेलीकाप्टर आया |
| उसमे भी खाया खूब खिलाया |
| सुरसा जैसी भूख हमारी हमें तो खाना है |
| मीलों हम आ गए मीलों हमें जाना है |
Friday, 17 May 2013
कभी तो
| और भी घना होगा अन्धेरा तो क्या |
| कभी तो कटेगी ये बियाबान रात |
| निकलेगा कभी तो यहाँ भी सूरज |
| कभी तो बस्तियों मे उजाला होगा |
| और भी कुछ होगा कफ़न के सिवा |
| पहनने को ज़िंदा लाशों के तन पर |
| अनगिनत मासूम इंसानों के बच्चे |
| रह गए आज सिर्फ कंकाल बन कर |
| कहीं घूरों पे कुत्तों से टुकड़ों की झडपें |
| अस्पतालों के बाहर दवाई को तड़पें |
| खाने को केवल जिन्हें गम हैं अभी |
| उनके भी हलकों में निवाला होगा |
| कभी तो बस्तियों मे उजाला होगा |
Thursday, 25 April 2013
क्या लगती है तुम्हारी
| देख पसीना आ जाता है |
| सांस गरम हो जाती है |
| चुँधिया जाती है आँखें |
| गर्दन नीचे झुक जाती है |
| गाल लाल हो जाते हैं |
| धड़कन थोड़ी बढ़ जाती है |
| गला सूखने लगता है |
| तबीयत जरा मचलती है |
| छेड़ हवा ने मुझसे पूछा |
| धूप तुम्हारी क्या लगती है |
Tuesday, 16 April 2013
स्याही और खून
| डूबती आशाओं को बेधती |
| सन्नाटों की छुरियाँ |
| छवियों से पूर्णतया रिक्त |
| आसमान और आँखें |
| अपनी ही छाया में विश्राम को उत्सुक |
| संघर्ष रत एक ठूंठ |
| काटने को दौड़ते एकांत में |
| प्रतिबिम्ब देखने को तरसता दर्पण |
| निद्रा से बोझिल पलकें लिए |
| अँधेरों की तलाश में व्यस्त सूरज..................... |
| ...............अद्भुत बिम्बों और मुहावरों |
| की खोज में गोते लगाता |
| रचना की प्रसव पीड़ा में |
| शब्द जाल बुनता |
| बंद पलकों और खुले प्रज्ञा चक्षुओं से |
| पंक्तियाँ पकाता |
| वो जो कवि कहलाता है भीतर |
| जब भी कभी खोलेगा आँखें |
| खोलेगा यदि कभी तो |
| अफ़सोस करेगा शायद |
| कि उसके हाथ में कलम की जगह |
| तलवार क्यों नहीं है |
Friday, 1 February 2013
टिक टिक टिक
| चल मेरे कुत्ते टिक टिक टिक |
| चल मेरे गदहे टिक टिक टिक |
| चल मेरे तोते टिक टिक टिक |
| चल मेरी बिल्ली टिक टिक टिक |
| चल मेरी भैंस टिक टिक टिक |
| चल मेरे हाथी टिक टिक टिक |
| चल मेरे ऊँट टिक टिक टिक |
| क्यों |
| वे सरकारें चला रहे हैं |
| जैसे मन करे |
| हम दो चार जानवर भी नहीं चला सकते क्या |
Thursday, 31 January 2013
इक बगल में चाँद
| मैंने कागज़ पर लिखा |
| आग |
| वह जला नहीं |
| पानी पानी का जाप किया |
| बुझी नहीं प्यास |
| पाक शास्त्र पढ डाले |
| नहीं मिटी भूख |
| कुछ तो गडबड है मुझमे |
| कुछ को आती है कीमिया |
| चुनाव होने को हैं |
| फिर बजेंगे भोंपू |
| फिर मिटेगी गरीबी |
| फिर दूर होंगी समस्याएं |
| फिर बनेगा देश खुशहाल |
| फिर मिलेंगीं सबको रोटियां |
| फिर सबके बगलों में चाँद होगा |
Wednesday, 16 January 2013
बस्तियाँ
| जीने में थी लाख अड़चने और सदा मरने का डर था |
| मिटटी की कमजोर दीवारें और टूटा फूटा सा छप्पर था |
| प्यार मोहब्बत रिश्ते नाते सब बिकते थे बाज़ारों में |
| हर ओर दुकाने लगी हुईं थी कहीं नहीं कोई घर था |
| बड़े बड़े विद्वानों का धंधा सही राह बतलाने का था |
| नहीं कहीं मंजिल थी कोई दुर्गम सा बस एक सफर था |
| बड़ा अचम्भा होता मुझको लोग जिसे बस्ती कहते थे |
| लाशों के अम्बार लगे थे खून से लथपथ पड़ा शहर था |
| मौत चीखती चिल्लाती नाचे फिरती थी गली गली |
| हंसने गाने की बात ही क्या सांस भी लेना दूभर था |
| जीने में थी लाख अड़चने और सदा मरने का डर था |
Thursday, 3 January 2013
विध्वंस
| तितलियों के पंख नोच डालने की चाहत |
| खिलते गुलाब की पंखुड़ियां तोड़ |
| बिखेर डालने की चाहत |
| किसी हिरन के उछलते दौड़ते नन्हे शावक को |
| मार गिरा देने की चाहत |
| देर शाम पहाड़ों के पीछे छिपते सूरज की खूबसूरत तस्वीर को |
| काले रंग से पोत डालने की चाहत |
| जिन किन्ही दिलों में कभी जन्म लेती है |
| वे लाख माने मर्द खुद को |
| समझें अपने को वीर |
| लेकिन ऐसा है नहीं |
| ताकत है अगर कुछ कर सकने की |
| तो कभी एक तस्वीर में रंग भर के दिखाओ |
| किसी दौड़ते को पंख देकर दिखाओ |
| किसी फूल में खुशबू डालकर दिखाओ |
| कोई बाग़ सजाओ तितलियों के लिए |
| वरना लानत है तुम्हारी ज़िन्दगी पर |
Monday, 31 December 2012
भारत पुत्री
| वह लड़ी होगी |
| वह बड़ी हिम्मत से लड़ी होगी |
| जीने की अदम्य लालसा लिए |
| मौत से इतने दिन लड़ते सबने देखा उसे |
| अपने सम्मान को बचाने ले लिए |
| उन दरिंदो से भी यक़ीनन खूब लड़ी होगी वह |
| और जाते जाते एक चुनौती दे गई है हम सब को |
| इंसानियत का हक़ अदा करने की चुनौती |
| वह कह गई है |
| हमसे कुछ सीखो तो लड़ाई मत छोड़ना |
| जीने की लड़ाई |
| सम्मान की लड़ाई |
| आजादी से सांस लेने की लड़ाई |
| पूरी ताकत भर विरोध में खड़े रहना दरिंदगी के |
| हमने तो खूब संघर्ष किया काले चेहरों से |
| अब तुम्हे मेरी कसम |
| सिर्फ चेहरों तक उलझ के मत रह जाना |
| उनके पीछे की पूरी कालिख को देख लेना ठीक से |
| एक एक कोने से निकाल खींचना अँधेरी साजिशों को |
| और मत बैठना चैन से |
| सूरज के निकलने तक |
Tuesday, 18 December 2012
सुदर्शन चक्र
| फिर दुस्शासन अपनी पर है |
| उसको यक़ीनन दुर्योधन का सहयोग है |
| सुरक्षा के जिम्मेदार धूर्त चालबाज शकुनि ने |
| शिखंडियों को लगाया है पहरों पर |
| कर्तव्य से बढ़कर मर्यादा का बोझ लादे |
| दुबके बैठे हैं चुपचाप विदुर द्रोण और भीष्म |
| कुछ देखना ही नहीं चाहती |
| पुत्र मोह से ग्रसित साम्राज्ञी गांधारी |
| ऐसा ही होता है एक अंधे राजा के शासन में |
| एक बार जो अत्याचार हो गया स्त्री पर |
| वस्त्र दान कोई उपाय नहीं है नारी की व्यथा का |
| उस पर हुये अत्याचार सिर्फ और सिर्फ गर्दनें उतारने से कम होंगे |
| अफसोस यह |
| कि भगवान कृष्ण भी आ जाएँ |
| तो वे भी सुदर्शन नहीं चलाते अपना |
| द्रौपदियों के नामों की लिस्ट बढ़ती जाती है रोज रोज |
Tuesday, 27 November 2012
भला क्यों
| न मानता है न सुनता है |
| जो चाहिए सो चाहिए |
| बस अपने से मतलब |
| ठीक है कि नहीं |
| सोचना ही नहीं चाहता |
| न सब्र है न करार |
| जिद है तो है |
| बड़ी मुसीबत है |
| एक पल को नहीं बैठने दे है चैन से |
| परेशान कर रखा है |
| इतनी दुश्मनी अगर है हमसे |
| तो फिर रहता क्यों हैं यहाँ सीने में |
Monday, 26 November 2012
Monday, 19 November 2012
चन्दन खबरें बंद भीड़ और टेलीविजन
| चन्दन की लकड़ी पर जलने से |
| बदन को कम तकलीफ होती है क्या |
| आत्मा सच में ज्यादा प्रफुल्लित होती है क्या |
| बड़े बड़े लोगों को शोकातुर देखकर |
| चिता का बनाव श्रृंगार क्या |
| स्वर्ग के द्वार पाल को रिश्वत होती होगी |
| बड़ी खबर बन जाने से |
| अंत क्या सुखदाई हो जाता होगा |
| लोगों का हुजूम क्या यमराज पर |
| कोई दबाव बना पाता होगा |
| बेहतर कक्ष आरक्षित करने में |
| तोपों की सलामी क्या स्वर्गाधीशों के लिए |
| अलार्म का काम करता होगा |
| भैया वी आई पी अभी आर आई पी हुए हैं |
| शीघ्र ही आपके द्वार पर पधारते होंगे |
| बंदनवार सजाइये |
| अप्सराओं को बुलाइए |
| दुन्दुभी बजाइए |
| और स्वागत के लिए सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाइए |
| ये जितने सी यम पी यम डी यम जी यम पधारें है यहाँ |
| सब हँसेगें इन बचकाने सवालों पर अभी अगर इनसे पूछो |
| लेकिन इतना तय है |
| यहाँ से जाकर ये भी |
| लग उन्ही कार्य कलापों में जायेंगे |
| जिनसे इन्हें भी मरणोपरांत मिल सके |
| चन्दन खबरें बंद भीड़ और टेलीविजन |
Friday, 16 November 2012
देखें तो सही
| ऐ जगमगाती रोशनियों |
| कभी आओ इधर भी |
| युगों से जहाँ पहुंचा नहीं कोई |
| उस पार के अँधियारे चाँद की |
| कुरूपता का बखान भी कभी हो |
| जिन खयालों पर अपराध के ताले लगें हैं |
| किस जमीन में वे पनपते हैं आखिर |
| चर्चा हो जाए ये भी कि |
| काले अक्षरों में सब कुछ सफ़ेद ही होता है क्या |
| जो झुठलाया जाकर भी होता तो है ही |
| जवान बेवा की कामनाएँ ज्यूँ दफ़न रिवाजों में |
| इंसानियत किन्ही अरमानों की |
| कब्रगाह बनी घूमती न हो सदियों से |
| सच के कुछ मोती न छुपे हों |
| गहरी अँधेरी घाटियों में कहीं |
| आओ चलके देखें तो सही |
| बने बनाए के बिगड जाने की आशंका |
| पुरुषार्थ को कोई चुनौती भी अगर है |
| फिर भी शायद |
| चाँद को एक बारगी ही सही |
| पूरी रोशनी में देख लेने की चाह |
| उद्वेलित करती है मुझे |
| कभी आओ इधर भी |
| ऐ जगमगाती रोशनियों |
Thursday, 8 November 2012
४७ पन्ने
| एक एक पन्ना ज़िन्दगी |
| इतिहास में चुपचाप ले जाकर |
| बाँध रखा है वक्त ने जिल्द में |
| मिटे मिटे से कुछ हर्फ़ |
| जिनमे बाकी है धीमी सी सांस अभी |
| धुन्धलाये से पड़े यहाँ वहा कुछ नुक्ते |
| याद की लहरों को झोंका देते हुए कई सफे |
| एहसासों की गर्मियां और |
| बुझती बुझती सी चन्द खुशबुएँ ज़िंदा हैं अभी |
| पन्नो के बीच दबे सूखे गुलाब |
| कागजों के मुड़े हुए कोने |
| एक पशेमंजर बयान करते हैं |
| रंगीन खुशनुमा दिलचस्प मुतमईन |
Tuesday, 9 October 2012
रस्सियाँ
चुपचाप खड़ा
वह धैर्य धन गर्दभ
पीछे का बांया पैर
और आगे का दांया
रस्सी से बंधे
चल तो पाता लेकिन घोंघे की चाल
मैंने अपने पैरों की तरफ देखा
मैंने औरों के पैरों की तरफ देखा
तमाम अदृश्य रस्सियों के मायावी जाल
एक दूसरे से बंधे घिसटते तमाम पाँव
और केंचुए सी रेंगती मनुष्यता
वह धैर्य धन गर्दभ
पीछे का बांया पैर
और आगे का दांया
रस्सी से बंधे
चल तो पाता लेकिन घोंघे की चाल
मैंने अपने पैरों की तरफ देखा
मैंने औरों के पैरों की तरफ देखा
तमाम अदृश्य रस्सियों के मायावी जाल
एक दूसरे से बंधे घिसटते तमाम पाँव
और केंचुए सी रेंगती मनुष्यता
Sunday, 7 October 2012
आमो खास
गुठली भर समझ के फेंक दिए गए
दबे रहे गहरे
उमस सडन अन्धकार और गर्मी से
निकले उगे पैदा हुए
और और
आम आदमी
खास लोगों द्वारा
जो चूसे गए
और फिर
गुठली भर समझ के फेंक दिए गए
दबे रहे गहरे
उमस सडन अन्धकार और गर्मी से
निकले उगे पैदा हुए
और और
आम आदमी
खास लोगों द्वारा
जो चूसे गए
और फिर
गुठली भर समझ के फेंक दिए गए
Friday, 5 October 2012
सपने तो आखिर सपने हैं
शिखरों पर बैठे जमकर
बहकर बनते झरने हैं
बादल कब किसके अपने हैं
सपने तो आखिर सपने हैं
फूल सहेजें लाख मगर
शूल ह्रदय में चुभने हैं
सुख जितना मिलता है
उतने ही दुःख सहने हैं
सपने तो आखिर सपने हैं
एक लहर ऊपर जाती है
वही मगर नीचे आती है
ऊपर नीचे आगे पीछे
नियति नाच नचाती है
भवनों के कंगूरे भी आखिर
धूल धूसरित होने हैं
इन्द्रधनुष के रंगों जैसे
सिर्फ हवा में सजने हैं
सपने तो आखिर सपने हैं
मरुस्थल हैं सागर भी हैं
और यहाँ पर हैं उपवन
कभी हार ही हाथ लगेगी
कभी जीत से आलिंगन
पल भर को गिरने से पहले
आँख में मोती सजने हैं
रोज टूटते रोज बिखरते
रोज मगर फिर बुनने हैं
सपने तो आखिर सपने हैं
Friday, 28 September 2012
कुट गए डार्विन भईया
| जब स्वर्ग पहुँचे डार्विन भाई |
| बंदरों ने कर दी उनकी पिटाई |
| बोले आदमी को ऊँचा बताते हो |
| उन्हें हमारा विकास बताते हो |
| वो तो बहुत ही गया बीता है |
| भाई भाई का खून पीता है |
| औरतों से ही जनम पाता है |
| कोख को उनकी कब्र बनाता है |
| किताबों में नारी का गुणगान करता है |
| हकीकत में घोर अपमान करता है |
| प्रेम के गीत गाता है |
| जीवन घृणा से बिताता है |
| दुनिया में हर कोई किसी का दुश्मन है |
| इंसानियत विकास नहीं हमारा पतन है |
Thursday, 20 September 2012
फुहारें
| जगह दे देती है सड़क |
| पानी को बारिश में |
| बैठ जाती है यहाँ वहाँ |
| उखड़े पत्थर बजरी |
| छोटे छोटे ताल तलैया |
| जलभराव और चलना मुश्किल गाड़ियों का |
| लगा जैसे कह रही है सड़क |
| ज़रा ठहरो भी |
| ये हर वक्त की भागम भाग क्यों |
| गाड़ियों को रहने दो भीतर |
| पुराने अखबार निकालो |
| नावें बनाई जायें |
| भूल गए हो तो सीख लो बच्चों से |
| बरामदे में बैठो |
| फुहारों के साथ मजा लो पकौड़ियों का |
| चाय पियो तसल्ली से |
| साथ हो प्रिय तो पहलू नशीं रहो कुछ देर |
| न हो साथ तो तसव्वुरे जानाँ की फुरसत निकालो |
| बूँदों के संग नाचो गुनगुनाओ |
| तनिक भीग भी लो |
| या यूँही बिता दोगे जिंदगी |
| सूखी सूखी सी |
Subscribe to:
Posts (Atom)
