Friday, 3 January 2020

बीती बिताई

कुछ बीत गया कुछ बिता दिया
कुछ भूल गया कुछ भुला दिया
कुछ उम्मीदों से रिश्ते थे 
कुछ रिश्तों से उम्मीदें थीं 
कोई बना रहा अनचाहा सा 
कोई चाहत के भी पार गया 
कुछ खूब निभा कुछ निभा दिया
कुछ बीत गया कुछ बिता दिया
कुछ जीवन था कुछ सपना था 
जो समय कटा सब अपना था 
इस दुनिया के कुरुक्षेत्र में 
इधर भी अपने थे और उधर भी 
कभी जीत गया कभी जिता दिया 
कुछ बीत गया कुछ बिता दिया
यादें धड़कन क़िस्से क़समें
कुछ तूफ़ानी कुछ शांत झील
कभी पार गया कभी डूबा भी 
इस काल चक्र के दलदल में 
फ़ंसा कभी कभी फ़ंसा दिया
कुछ बीत गया कुछ बिता दिया
सूरज ने जलाया ज़रा ज़रा
बारिश ने गलाया धीरे धीरे
हवा सुखाती चुपचाप रही 
हम समझे थे जीवन जिसको
टुकड़ों टुकड़ों में चला गया 
कुछ भूल गया कुछ भुला दिया

Friday, 6 December 2019

कानून के हाथ

सुना होगा
कानून की आँखें नहीं होतीं
ऒर सुनिये 
उसके पाँव भी नहीं होते 
और न ही हाथ
अगर चलना है कानून तो
किसी न किसी को तो उसे चलाना होगा 
किसी न किसी को तो हाथ देने होंगे अपने 
ले लो हाथ में जिनका काम है ये 
वरना कोई न कोई तो लेगा ही
हाथ में कानून 

Wednesday, 15 November 2017

ऐ लड़कियों

ऐ गंदी लड़कियों 
ऐ घूमने फिरने वाली लड़कियों 
सूर्यास्त के बाद भी 
तुम्हारे पैरों में चलने फिरने की ताकत रहती है आश्चर्य 
तुम्हे बनाते समय ईश्वर से कोई भूल हो गई होगी ज़रूर 
ऐ निर्लज्ज लड़कियों 
ऐ पढ़ी लिखी लड़कियों 
सिनेमा देखने के बावजूद  
तुम्हारी आँखों में देखने की शक्ति बनी रहती है आश्चर्य 
तुम्हे बनाते समय ईश्वर से कोई भूल हो गई होगी ज़रूर 
ऐ चाऊमीन खाने वाली लड़कियों 
ऐ तंग कपडे पहनने वाली लड़कियों 
ऐ हंसी मजाक करने वाली लड़कियों 
तुम्हे बनाते समय ईश्वर से कोई भूल हो गई होगी ज़रूर 

Tuesday, 14 November 2017

दिल्ली की धुंध

दिल्ली धुंध में है 
अब तो पता चल रहा है अंधों को भी 
आँख वाले कहते हैं लेकिन 
तख्तो ताज की मेहरबानी से 
बरसों से है 
धुंध में दिल्ली 

Monday, 13 November 2017

अमरत्व

वे चाहते हैं 
इतिहास के पन्नों पर दर्ज हो जाना 
जिन राहों पर चलकर 
वे जाती हैं वहां जहाँ 
न कोई होगा इतिहास लिखने वाला 
और न पढने वाला 

Monday, 29 May 2017

विकास का भोंपू

बज रहा है भोंपू दिन रात 
विकास विकास विकास विकास 
बह रहा है चारों ओर विकास 
लाउड स्पीकरों से निकलकर 
नया नया बना है 
गरम होगा शायद 
बटोर ही नहीं पा रही जनता
लपक के नालियों में जा बहता है 
थोड़ा थोड़ा चाट लेते हैं कुत्ते 
सुअरों की मौज है 
ख़ूब भर रहे हैं पेट और घर 
कोलाहल मचा रहे हैं 
तालियाँ पीट रहे हैं 
उत्सव मना रहे हैं जगह जगह 
ख़ाली पेट आम आदमी 
जलसे में खड़ा होके खींसे निपोरने को बाध्य है 
नहीं तो कहीं ग़द्दार न क़रार कर दिया जाए मुल्क का 

Monday, 20 March 2017

बैठक

सब कुछ ख़त्म हो जाने के बाद 
बाकी बची यादें 
गाहे बगाहे
बियाबान सन्नाटों में दीवारों से 
टकराती फिरती रहेंगी 
किसी के उलझन का सबब 
किसी के आंसुओं का राज़ 
किसी की तन्हाइयों की हमसफ़र 
किसी के परों का हौसला 
कहाँ तक लेकिन 
और कब तक 
उलझन आंसू तनहाई पर और दीवारों के 
खत्म हो जाने के बाद 
उन अनाथ यादों के लिये 
वक्त और कायनात की गिरफ्त में 
सफ़र करते रहने के दरम्यान 
आओ मिल बैठें और रोलें 
ज़रा देर हम तुम 

Saturday, 22 October 2016

छोटे बड़े भिखारी

भिखारी का कोई दीन धरम नहीं होता 
मंदिर मस्जिद गिरजा गुरुद्वारा या मदिरालय 
कहीं भी मांग लेता है 
उसकी कोई जात बिरादरी भी नहीं होती
हिन्दू मुस्लिम इसाई या फिर अधर्मी 
किसी से भी मांग लेता है 
बाकी और लोग 
जो अपने को भिखारी नहीं समझते 
एक ही जगह जाते हैं मांगने 
हर बार जब भी कुछ चाहिए 
मिले न मिले 
मंदिर तो मंदिर मस्जिद तो मस्जिद 
और कुछ नहीं भी जाते कहीं मांगने 
जहाँ बैठे वहीं मांग की जप चलती रहती रहती है 
इस मामले में हम सब ज्यादातर लोग 
बहुत संकुचित भिखारी नहीं हैं क्या ?

Monday, 18 July 2016

ख़ूनी किताबें

किताबें हैं आजकल 
बम बनाना सीख सकते हैं लोग 
जिन्हें पढ़कर 
लोग हैं जो समझा सकते हैं 
पढ़कर उन्हीं किताबों से 
खुद अगर न समझो तो 
कैसे और कहाँ उन बमों से 
सबसे ज़्यादा खून मासूमों का बहे 
ऐसी तरकीबें भी बताते है ये लोग 
ग़ज़ब तो ये है 
कि क्यों किया जाना चाहिए ऐसा 
यह भी बता देते हैं ये लोग 
एक किताब पढ़कर 

Friday, 5 February 2016

दशहरा

चमचमाती बिजलियां 
बेतहाशा शोर 
बड़े बड़े लोहे के रथों पर सवार 
हथियार बंद लोगों का हुजूम 
भारी तमाशबीन भीड़ को चीर
जगह जगह घूमकर
कागजों के पुतले जलाते 
अट्टहास करते रहे 
बहुत सारे रावण 
साल दर साल 

Tuesday, 23 December 2014

अधर्म परिवर्तन

परिवर्तन है धर्म 
जड़ मान्यताओं से 
विनाशक परम्पराओं से 
तथ्यहीन आदर्शों से 
चिंतन विहीन विश्वासों से 
तनाव कटुता वैमनस्य संहार में डूबी 
सामूहिक आत्मघात की ओर अग्रसर 
मानवता की दिशा में 
परिवर्तन है धर्म 
न कि 
धर्म परिवर्तन 

Friday, 11 July 2014

ऐ लड़कियों

तुम पर तुम्हारी कोई मर्जी नहीं चलेगी 
बताय जाएगा तुम्हे किसी और के द्वारा 
क्या पहनो क्या न पहनो
क्या खाओ क्या न खाओ
कहाँ जाओ कहाँ न जाओ 
किससे बोलो किससे बतियाओ 
हंसी मजाक तुम्हारा काम ही नहीं 
तुम तो बस हुकुम बजाते रहो 
मन तो है ही नहीं तुम्हारा आत्मा भी नहीं है 
न मानो तो सज़ा के लिए शरीर है तुम्हारा 
कदम कदम पर वही करो जो तुम्हे करने को कहा जाए 
मन का हो न हो 
पल पल वैसे ही जियो जैसे कि तुम्हे जीने दिया जाए 
मन का हो न हो 
ऐ लड़कियों 
तुम कुछ भी करने के लिए नहीं हो आजाद 
क्योंकि वे चाहते हैं ऐसा 
वही वे जिन्हें करती हो तुम पैदा और पालना  
और वो भी तुम्हारी मर्जी से नहीं 
किसे और कब पैदा करो या न करो 
वे ही तय करेंगे 
एक दिन कहीं इन सब से होकर बहुत परेशान 
तुम सब एक साथ कहीं मौत पर अगर चला बैठीं अपनी मर्जी 
तो?

Thursday, 3 July 2014

संस्कृति के रखवाले

इधर मत खड़े हो 
वो मत देखो
देखो वो मत खा लेना 
ना ना उसको तो पीना ही मत 
तुम्हे नहीं करने देंगे ऐसा 
हम हैं ठेकेदार धरम के 
और संस्कृति के रखवाले हैं हम 
कैसे गिरने दे सकते हैं तुमको 
नैतिकता का सारा भार है कन्धों पर हमारे 
और हम ही हैं जगत गुरु 
साक्षात ऋषि मुनियों की सन्तान 
न धमकाएं हम तो नरक बन जाए ये समाज 
हमारे बिना रसातल में समा जाए ये धरती 
अरे सुनो 
ओ आधुनिक कहलाने वालों भ्रस्टों 
ओ पश्चिमी असभ्यता ओढ़े दुराचारी लोगों सुनो 
ये चीखपुकार सुनकर एक आधुनिक भ्रष्ट राहगीर ने 
उस सुनसान रास्ते किनारे एक गड्ढे में झाँका 
जहां से ये आवाजें आ रहीं थीं 
एक मरियल जर्जर बूढा शरीर नीचे पड़ा रिरियाया 
बाबू जी कुछ पैसे दे दो 
कुछ खाया नहीं कई दिनों से 

Monday, 12 May 2014

रंग बिरंगी

चलो लग जाओ सब फिर से अपने अपने काम में 
रात देर से घर लौटने वाली गरीब घर की कामकाजी लड़कियों 
वापस लौट आओ सपनों से 
और फिर तैयार रहो किसी दुपाये जानवर के आघात से  
अब भी कुछ बदला नहीं है 
रोज ईंटा ढोकर गुड़ रोटी खाने वालों 
सोच समझ के बीमार पड़ना 
या देख समझ के आना किसी ट्रक के नीचे 
अब भी किसी ढंग के अस्पताल में कोई जगह नहीं है तुम्हारे लिए 
लगा दो छोटे लड़के को फिर किसी पंचर बनाने की दूकान पे 
और छोड़ दो ये ख़याल कि अफसर बनेगा वो  
ढंग के स्कूल अभी भी नहीं हैं उसके लिए 
मनरेगा में फावड़े चलाओ कुछ दिन तो पेट भरेगा 
न हो ठीक से फसल सूखे में तो खा लेना जहर 
कौन बड़ा मंहगा मिलता है 
बिटिया को रौंद दे कोई दरिंदा तो  दुआ करना कि वो मर ही जाए 
या तो शर्म से या फिर सरकारी अस्पतालों की मेहरबानी से 
कुछ नहीं बदला है अभी भी तुम्हारे लिए 
मेला लगा था चार दिन का 
परजा तंतर का रंगीन मेला 
सजी थीं बड़ी बड़ी दुकाने 
खड़े थे हरकारे जगह जगह 
हाथ जोड़े सजाये रहे दुकाने 
सब हो चुका व्यापार 
हो चुकी कमाई जो जो करने निकले थे 
ख़तम हो गया सब तमाशा अब लौट आओ 
रंग बिरंगे सपने देख लिए बहुत तुमने 
अब तो मर ही रहो जो स्बर्ग देखना हो तो 
और कोई चारा न है और न था कभी 
मन तो नहीं करता है इसके आगे सोचने का 
लेकिन दिल है कि मानता नहीं ये कहने से 
कि और न कभी होगा 

Tuesday, 8 April 2014

पिता जी को श्रद्धा सुमन

शुरू जहाँ से किया था 
काफी ऊपर आ गया उससे 
मेरी तो नहीं लेकिन 
औरों की अपेक्षा से बहुत ऊपर 
छोडो बस अब बैठ रहो 
अकसर आता है ये ख़याल 
फिर मुझे याद आ जाते हैं अपने पिता 
एक अजीब डर से फिर चलने लगता हूँ 
वे होते तो ज़रा भी संतुष्टि नहीं दिखाते 
वो जो आगे उस छोर पर एकदम आख़िरी मानव कदम है 
जिसके आगे कोई कभी नहीं गया 
वहां पहुँचने पर भी शायद नहीं 
मुझ जैसे निखट्टू को 
उनके जैसा ही धकियाने वाला चाहिए था 
बचपन के समय तो बुरा लगता था बहुत 
अब मैं लेकिन बहुत आभारी हूँ उनका 
अफ़सोस ये कि वे ठहरे नहीं  
मेरे आभार प्रकट करने तक 

Monday, 31 March 2014

चमगादड़ और दीये

सवेरों ने अब अंधेरों से सांठगाँठ कर ली है 
रात के बाद दिन नहीं अब केवल रात ही आती है फिर से 
दूसरी तरह की रात बदलकर नाम और पहनावा 
अंधेरों में चलते काम करते जीते हुए लोग 
बेबस लाचार टकराते रहतें हैं एक दूसरे से 
सर फोड़ते रहतें दीवारों से 
बहाते खून 
खीझते स्वयं और अन्यों से 
कोसते जीवन और देवों को 
रोते दुर्भाग्य पर मानकर नियति अपनी 
और हमारी दुर्दशा पर हंसते 
अट्टहास करते मजे से जीते 
सुख से रहते 
इन्हीं गहन अंधेरों में देख सकने में सक्षम 
उल्लू और उनके चेले चमगादड़ 
संसदों में विराजमान ये जीव तो दूर करने से रहे अन्धेरा 
ताकत हो तो हम ही उगायें कोई सूरज 
हिम्मत हो तो हम ही जलें दीयों में 

Wednesday, 26 March 2014

जननी

अब उसके अपने पंख नहीं रहे 
अब नींद भी उसकी अपनी कहाँ रही 
जागी आँख से स्वप्न देखने की सहूलियत नहीं है उसे 
भविष्य को सोचने के लिए समय चाहिए 
जो कभी रहा ही नहीं उसके पास 
जो बीत गया सो बीत गया 
और ऐसा भी कुछ नहीं उसमें 
जो सोचने योग्य हो 
अभी जो है वही है 
और कैसा है वह 
सोचने से भी डर लगता है उसे 
प्रकृति एवं नियति की उससे अपेक्षा है 
नई मनुष्यता के जन्म की 
जिसके पास हों 
स्वप्न जो वो देख नहीं पाती 
उड़ान जो वो भर नहीं पाती 
इतिहास जहां वो जाना नहीं चाहती 
भविष्य जिसकी वो योजना नहीं कर सकती 

Monday, 24 March 2014

डंडा झंडा बैनर बिल्ले; शोर मचावें खूब निठल्ले

आजकल हम फिर से 
खून जलाते हैं अपना 
रोज सुबह और शाम 
देर शाम टीवी पर नेतागण 
अपने मुखार विंदुओं से 
जो अनर्गल प्रलाप का प्रवाह करते हैं 
उसकी शोभा अनुपम है 
और फिर सुबह अखबारों में 
उसी सब का विस्तृत वमन 
अहा क्या छवि होती है 
कलेजे तक उतर जाती हैं 
कुर्सी पर विराजते ही राम राज्य के स्वप्नों से मंडित 
उनके लोक लुभावन वादे 
मैं और मेरा सब सही बाकी सब है खट्टा दही 
उनकी उठा पटक 
समाज कल्याण गरीबी उन्मूलन स्त्री सुरक्षा की भावनाओं से ओतप्रोत 
उनकी इधर से उधर छलांगे 
असल समस्या लेकिन कुछ और ही है मेरी 
वो ये कि इस नामुराद को न भूलने की बीमारी है 
तो फिर जब ये अलौकिक लोकतांत्रिक महोत्सव का समापन होगा अभी कुछ समय बाद 
तो मेरा दिमाग ले आया करेगा खोद खोद के गर्त में से यही सब 
और चिढ़ाया करेगा फिर रोज सुबह और शाम दिल को 
और जलाया करेगा खून 
मैं सोचता हूँ कि 
आदमी की अगर औकात न हो भगत सिंह बन पाने की 
तो कम से कम याददास्त जरूर खराब होनी चाहिए 
बेहतर हो कि दिमाग ही कमज़ोर हो अगर हो तो 

Saturday, 22 March 2014

परवश

डाल से टूटा हुआ 
एक सूखा पता 
हवाओं में लहराता हुआ 
इधर उधर डोलता रहा 
हमने देखा !
विवश असहाय 
नियति के पाश से बाध्य  
हमने सोचा !
वो पत्ता भी क्या 
ऐसा ही सोचता है 
स्वयं एवं अन्य के विषय के ?
या अहम् केवल 
सनक हम मनुष्यों के मस्तिष्क की ही है!

Friday, 14 March 2014

भीड़भाड़ और भेड़िये

लो फिर आ गया मौसम 
टोपियाँ पहनकर टोपियाँ पहनाने का 
टोपियाँ उछालने का मौसम 
उन्हें जिताने का मौसम 
जो सब जीते हुए हैं ही  
उनके द्वारा जो सब हारे हुए हैं 
बड़ी गंभीरता से मजाक करने का मौसम 
गंभीर मसलों को मजाक में उड़ा देने का मौसम 
खीसें निपोरने का मौसम 
रुपये बोने का मौसम 
पत्ते काटने का मौसम 
तलुवे चाटने का मौसम 
वादे बरसाने का 
बहलाने फुसलाने का 
हरे हरे नोटों का 
जनता के वोटों का 
फिर आ गया मौसम