Monday 29 May 2017

विकास का भोंपू

बज रहा है भोंपू दिन रात 
विकास विकास विकास विकास 
बह रहा है चारों ओर विकास 
लाउड स्पीकरों से निकलकर 
नया नया बना है 
गरम होगा शायद 
बटोर ही नहीं पा रही जनता
लपक के नालियों में जा बहता है 
थोड़ा थोड़ा चाट लेते हैं कुत्ते 
सुअरों की मौज है 
ख़ूब भर रहे हैं पेट और घर 
कोलाहल मचा रहे हैं 
तालियाँ पीट रहे हैं 
उत्सव मना रहे हैं जगह जगह 
ख़ाली पेट आम आदमी 
जलसे में खड़ा होके खींसे निपोरने को बाध्य है 
नहीं तो कहीं ग़द्दार न क़रार कर दिया जाए मुल्क का