Friday, 30 September, 2011

एक गीत

मत देखो कितना शिक्षा का भण्डार भरा है 
मत देखो कितना दौलत का अम्बार लगा है 
इन चीजों से कभी भला कौन बड़ा होता है 
मगर देखना दुनिया को कोई क्या देता है 
मत देखो कितने व्रत उपवास कोई करता है 
मत देखो नमाज में कोई कितना झुकता है 
मत देखो पत्थर पर कितना माथा घिसता है 
मगर देखना कोई कितने हृदयों में बसता है  
मानवता का इतिहास हमारा ये बतलाता है 
अपने कृत्यों से ही कोई महान कहलाता है 
मत देखो पीछे कितनी वो भीड़ जुटा लेता है 
नायक तो खुद को सब के लिए लुटा देता है 
दो कृष्ण नहीं होते जग में दो राम नहीं होते हैं
ईसा और गौतम कईयों के नाम नहीं होते हैं
मत देखो वो किस महापुरुष जैसा दिखता है 
देखो तो निजता में कोई कितना खिलता है 

Thursday, 29 September, 2011

नवरात्रि व्रत कथा

मर्द बच्चे भी आखिर क्या चीज हैं
ज़रा सोचो 
हाथों में दफ्तर का बैग 
या बाज़ार से सामन लाने का थैला लिये हुये 
निकलती हैं जब देवियाँ सड़क पर 
अपनी शालीनता के वाहन पर सवार 
कोई भी कोर कसर नहीं छोड़ते मर्द बच्चे 
छेड़खानी करने से 
चीखती चिल्लाती सर पटकती रहती हैं घरों में 
शराब कबाब ज़रा कम कीजिये  
ज़रा पुण्य धरम कर लीजिए 
नहीं सुनाई पड़ता
जब तक कि वो 
एक हाथ में तलवार 
और दूसरी में लहू से भरा खप्पर लिए
सवार ही न हो जाये शेर पर  

Wednesday, 28 September, 2011

महा न भारत

सत्ता है शिखंडियों के हाथ 
मामा शकुनि को सौंपी है विदेश नीति
सेनापति दुर्योधन के पास है गृह मंत्रालय 
विधवा आश्रम नवोदय कन्या विद्यालयों आदि की 
देखरेख के महत कार्य का बीड़ा उठाया है दुष्शासन ने 
सर्वोच्च न्यायालय आधीन है प्रज्ञाचक्षुधारी राजा धृतराष्ट्र के 
आँखों पर पट्टी बांधे साम्राज्ञी गांधारी 
राज निवास में कोड़े फटकारते घूमते 
अपने बाकी अट्ठानवे सुपुत्रों को बाँट रहीं हैं रेवड़ियाँ 
जंगलों में घूम घूम कर एकलव्यों के  
अँगूठे बटोरते गुरुवर द्रोणाचार्य 
बन बैठे हैं अंगुलिमाल 
राष्ट्र से बढ़कर अपनी प्रतिज्ञा के प्रति निष्ठावान 
पितामह पड़े हैं मृत्यु शैया पर 
महात्मा विदुर सेवा निवृत्ति के बाद की 
अपनी राष्ट्राध्यक्ष की नियुक्ति के जोड़ तोड़ में हैं व्यस्त 
वनवास के बाद आजीवन अज्ञातवास पर
पता नहीं कहाँ गायब हैं पांडव अपनी पत्नियों के साथ 
उन्मादक बसंत ऋतु में 
केतकी पुष्पों की सुगंध से परिपूर्ण वायु  
और कामदेव के तूणीरों की भांति  
मंडराते भ्रमरों के बीच 
जमुना किनारे मनोरम लता कुंजों में 
मुकुट कुंडल वनमालादि से अलंकृत 
तन्वंगी कमनीय अक्षत यौवनाओं के साथ 
विलास क्रीड़ा में लिप्त हैं बेसुध कामोत्सवमग्न 
बंसी बजाते मनभावन विघ्नविनाशक रसिया 
श्री कृष्ण !

Monday, 26 September, 2011

बेटियाँ

बंद करो इसे सीता कहना 
ये नए समय की नारी है 
अबला नहीं ये सबला है
और सब मर्दों पर भारी है 
बन्दूक उठाकर हाथों में 
सरहद पर जान गंवाती है 
सब पर मालिक की तरह  
दफ्तर में हुक्म चलाती है 
खेल कूद के मैदानों में
इसने भी बाजी मारी है 
ये नए समय की नारी है 
हर जगह बराबर खड़ी हुई
दावा करती सिंहासन का
आन पड़े तो कर गुजरेगी 
ये चीरहरण दुशासन का
बहुत दिनों से सहती आई 
अब बन गई शिकारी है 
ये नए समय की नारी है 
कभी छेड़ ना देना इसको 
ये कुछ भी कर सकती है 
अगर जरूरत पड़ जाये तो
रावण को हर सकती है 
दुष्टों इससे डर के रहना 
अब ये रही नहीं बेचारी है 
ये नए समय की नारी है 
कुछ भी सहते जाने को
औरत अब लाचार नहीं है 
ज़रा भी पीछे रहने को 
ये बिलकुल तैयार नहीं है 
अपना मालिक बनने की 
अब इसकी पूरी तैयारी है 
ये नए समय की नारी है 

Friday, 16 September, 2011

एस धम्मो सनंतनो

खुद अपने पैरों से चल कर ही मंजिल मिलती है 
मत बैठ किसी सहारे रहना कदम बढाते रहना 
सबको लेकर चलना ही मानवता कहलाती है 
रह जाये न सोया ही कोई आवाज लगाते रहना 
रोज सवेरे घर घर जाकर सबको दस्तक देता है 
चिड़ियों के गले में रोज वही मीठे स्वर भर देता है 
माना खुद अपने दम पे दुनिया रोशन कर देता है 
एक ज़रा सा बादल लेकिन सूरज को ढक लेता है 
मत बैठ सहारे उसके रहना दिये जलाते रहना 
माना वे नावों को अक्सर मंजिल तक पहुँचाती हैं 
तूफ़ान उठाकर मगर कभी रस्ते से भटकाती हैं 
मर्जी से चलती हैं अपनी मर्जी से रुक जाती हैं 
इसीलिए तो बावरी हवाएं आवारा कहलाती हैं 
मत बैठ भरोसे जाना उनके पतवार चलाते रहना 
पहन के टोपी घूम रहे हैं तिलक लगाये बैठे हैं 
बाँट के भेड़ बकरियों जैसे भीड़ जुटाए बैठे हैं 
मुर्दा राख का खेल रचाते देते आग का नाम 
धर्म के नाम पे धंधा करते ईश्वर को बदनाम 
अंगार बनाए रखना हो तो राख गिराते रहना

Thursday, 15 September, 2011

ईंटें कंगूरों की

जब कभी काव्य जगत में 
चर्चा होती है किसी भवन की 
महिमामंडित किया जाता है नींव की ईंट को 
महान बलिदानी ईंट 
मजबूत गुमनाम चुपचाप 
पूरे भवन का बोझ उठाये 
ठीक है 
लेकिन नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता 
उन इंटो को भी
जो बनाती हैं 
भवन की शोभा कंगूरों को  
क्योंकि उन सुसज्जित कंगूरों के बगैर 
याद करने का कोई भी ज़रिया नहीं बनता
नींव की ईंटों को

(अभियंता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं)

Friday, 9 September, 2011

बहुरि करैगो कब

काल करे सो आज कर....
सेठ जी ने ये वचन तख्ती पर लिखवाया
और फ़िर इसको अपने दफ्तर में टंगवाया 
उनने सोचा था कुछ फर्क पड़ेगा 
इंसान थोड़ा जल्दी काम करेगा 
अगले ही दिन सुबह धमाल हो गया 
सारे दफ्तर का बुरा हाल हो गया 
सभी के मन में कुछ न कुछ चल रहा था
भीतर ही भीतर बहुत कुछ पल रहा था
पढते ही सबको ये महा वचन भा गया 
जो मन में था वो करने का समय आ गया 
सोया हुआ दरबान जाग गया 
और तिजोरी उठाकर भाग गया 
चपरासी को बदले का मौका मिल गया 
वो जूता लेके अफसरों  पे पिल गया 
क्लर्क ले भागा टाइपिस्ट को लेकर 
पिटने से पहले खिसक लिया मैनेजर 
जनता ने सेठ की खूब करी पिटाई
डाइरेक्टर ने उड़ाली उनकी लुगाई 
मुफ्त तमाशा देख रहे नौकर 
काल करे सो आज कर....

Thursday, 8 September, 2011

लोक का अलौकिक तंत्र

सूखे में बरबाद होना है या कि बाढ़ में
भूख से मरना पसंद है आपको
या कि इलाज के अभाव में
रेल दुर्घटना में भी मरने की सोच सकते हैं आप
किसी मंदिर की रेलमपेल में भी हो जाएगा ये काम 
घायल होकर अपाहिज होना  हो तो इतने तरीके उपलब्ध हैं 
कि गिनाए ही न जा सकें 
जो चाहो चुन लो अपने परेशान होने की वजह
सारे विकल्प खुलें हैं
आपकी बेटी का रेप हो सकता है
या आपके बेटे का इनकाऊंटर
या फ़िर आत्महत्या भी कर सकती है आपकी बीवी 
गरीबी की लाचारी में 
चुनाव आपका है
स्वतन्त्र हैं आप चुनने को
कच्ची देशी जहरीली शराब 
बच्चों के स्कूलों में जहरीला दलिया
विषाक्त दूध फल सब्जियां 
नकली दवाएं म्लेच्छ पानी 
आपको बेकार में अपना दिन बरबाद करना है 
बहुत सुविधाएँ है 
किसी कचहरी में अर्जी को चले जाइए 
राशन के दफ्तर या फ़िर 
जन्म मृत्यु कार्यालय में 
अपने मरे बाप का सर्टिफिकेट लेने पहुँच जाइए 
आपको अपना खून जलाने का शौक है
इनकम टैक्स का दफ्तर है
नगर निगम का अद्भुत कार्यालय है 
बैठे ठाले आ बैल मुझे मार का मन हो आये तो 
पुलिस तो खैर है ही 
सेवा में तत्पर सदैव 
अनगिनत सेवायें हैं 
अनगिनत विकल्प हैं 
सतपुड़ा निवासी नेता आपकी गर्दन पर सवार होकर
आपकी जेब से खींचे आपकी गाढ़ी कमाई का रुपया 
या फ़िर गंगा किनारे वाला सफेदपोश शातिर गुंडा नेता  
तमाचा मार के आपके मुंह से निकाल ले निवाला  
खूब विकल्प हैं 
खूब चुनने को है 
मस्त हैं राजा
परजा की ऐसी तैसी है 
अजब तमाशा है
गजब डेमोक्रेसी है

Wednesday, 7 September, 2011

घर वापसी

क्या पूछेगा घर वापसी पर
मेरा पिता मुझसे
कितना धन कमाया
ये पूछेगा क्या
या यश पद प्रतिष्ठा की कमाई का मांगेगा हिसाब
जाँच करेगा क्या
दान पुण्य धरम ईमान की
शायद नहीं
ये सब नहीं पूछेगा वो
जहाँ तक मै समझता हूँ उसे
वो जानना चाहेगा कि
किसी दिल मे राह की
या नहीं

Tuesday, 6 September, 2011

विशेषाधिकार

चलो माना कि बुरी लगती हैं गालियाँ 
लेकिन गोलियों से फ़िर भी बेहतर हैं
यहाँ करोड़ों लोगों को गालियाँ खाके रोटी तक नहीं मिलती 
रोटियों कि खातिर खाते हैं न जाने कितने यहाँ पर गोलियाँ 
जहाँ लोगों का ये अधिकार है मौलिक 
कि इतना मिले उन्हें कि वो जी तो सकें कम से कम 
उनमे से ज्यादातर को रोज भरपेट रोटी सूखी तक नहीं है 
अपने बीमार बच्चों औरतों और बूढों को ले जाएँ 
उन अस्पतालों में जहाँ अधिकार है उनका 
उनकी हिम्मत तक नहीं होती उस ओर झाँकने की
सडक पर प्रसव को मजबूर गरीब औरतें 
बजबजाती नालियों से बीन कर पेट भरने की कोशिश में
हमारे देश का नन्हा मासूम भविष्य
ख़ुदकुशी को मजबूर हमारे अन्नदाता 
दुत्कार दिए जाते हमारे शहीदों के परिजन 
कहाँ हैं उनके जीने के अधिकार 
क्या उनका हिस्सा नहीं है उस जमीन के टुकड़े पर
जिसको खोदकर निर्दयता से चंद लोग 
सब तरह के ऐश और आराम जुटाते हैं
या जगमगाती ऊँची इमारतें बनाकर 
रात रात भर महफ़िलें सजाते हैं 
वहीं बाहर ठण्ड में न जाने कितने दम तोड़ देते हैं 
दाने दाने को मोहताज करोड़ों लोग 
जब इस व्यवस्था में रह जाते हैं अनपढ़ 
और बने रहते हैं लाचार पशुओं से भी बदतर 
तुम इनकी बेबसी पर करते हो सियासत 
लूटते खसोटते रहते हो इनकी हड्डियाँ और चूसते हो खून 
खाते उड़ाते रहते हो इनके हिस्से का सरे आम लूट कर
और इस बेबसी लाचारी असहायता से क्षुब्ध होकर
निकल जाये किसी के गले से तुम्हारे लिए अपशब्द  
तो तुम्हारे विशेषाधिकार का हनन हो गया 
तुम्हे ये विशेष अधिकार दिया किसने
क्यों है ये विशेष अधिकार तुम्हारे पास
जिन नियम कानूनों के तहत 
तुम अपने इस विशेषाधिकार का रोना रोते हो 
उन्ही के तहत ये जिम्मेदारी तुम्हारी है कि 
लोगों के साधारण अधिकारों की तो रक्षा हो कम से कम 
जब तक नहीं होता ऐसा
तुम किस मुंह से करते हो अपने विशेष अधिकार की बातें 
कुछ तो शर्म खाओ 
इन छुद्र बातों पर व्यर्थ समय गंवाकर 
और गुमराह तो न करो जनता को 
यदि तुम सचमुच अपने विशेष अधिकार पर गर्व करते हो 
तो उसे कमाओ अपने आचरण से कृत्यों से 
ना कि छीनने कि कोशिश करो डंडे के जोर पे 
अब बाज आओ छीनने झपटने चुराने और जोर जबरदस्ती से  
वक्त आ गया है कि ठन्डे दिमाग से सोचो 
ज़रा आराम करो 
और तुम्हे जिस काम के लिए हमने नियुक्त किया है 
सिर्फ वही काम करो 

Friday, 2 September, 2011

दिल्ली की नज़र से

गाँव को देखो कभी दिल्ली की नजर से
बेहतर इनको पाओगे किसी भी शहर से 
भूखा वहाँ अब एक भी इंसान नहीं है
गरीबी से आज कोई परेशान नहीं है
बीड़ी दारु की एक भी दूकान नहीं है
जान खुद की लेता किसान नहीं है 
ऐसा हमने जाना है टीवी की खबर से
गाँव को देखो कभी दिल्ली की नजर से
मिलता है सबको पीने को साफ़ पानी 
मजबूरी अब नहीं है रोटी सूखी खानी 
स्कूल पढ़ने जाती है गुड़िया सयानी 
तंदुरुस्त हैं बच्चे बूढ़े स्वस्थ हैं नानी
कोई नहीं मरता है यहाँ शीत लहर से 
गाँव को देखो कभी दिल्ली की नजर से
लहलहाती फसलें हैं गोदाम भरे हैं
लदे पेड़ फल फूलों से मैदान हरे हैं
बिजली सडक स्कूल अस्पताल है 
गाँव गाँव इस देश का खुशहाल है 
औरतें महफूज़ हैं अब जोर जबर से
गाँव को देखो कभी दिल्ली की नजर से