Sunday, 28 February, 2010

खोज

खोज जारी है
कभी किताबों मे
कभी पहाड़ों पर
खोज ले जाती रही मंदिरों तक
बाज़ारों तक
दोस्तों की महफ़िलों तक
बिस्तरों पर खोजते रहे
और रसोईघरों में भी
खूबसूरत बगीचे देख डाले
और बियाबान जंगल भी
कभी अस्पतालों मे भी देखा
कभी किसी की आँखों मे
न सागर तट बच पाये खोज से
न दरिया की मौजें
लोगों के गीतों मे तलाशा
अपनों के आँसुओं मे झाँका
बहुत देर हुई
खोज जारी है
और अब तो ढूँढते हैं आईना
कि ये तो देख सकें
कि कौन खो गया है

Saturday, 27 February, 2010

ड्रेनेज़ सिस्टम

पुरुष और स्त्री व्यक्ति हैं
पत्नी एक सम्बन्ध है
घर के इन सम्बन्धों में
पनपती है गन्दगी
वेश्या भी एक सम्बन्ध है
बाहर का ये सम्बन्ध है निकास
जो साफ़ होना चाहिये वहाँ गन्दगी है
और जो गन्दा जान पड़ता है वो सफ़ाई के लिये है
न हो अगर नालियाँ
उस गन्दगी के निकास को
जो रोज़ पैदा होती हैं घरों में
तो क्या हाल हो घरों का
हाँ नालियाँ खुली अच्छी नहीं लगतीं
इसीलिये ढक के रखता है इन्हें
सभ्य समाज

Friday, 26 February, 2010

चारदीवारी

जिस चारदीवारी के पीछे खड़े होकर
तुम बादलों के चटकीले रंग निहारती हो
वास्तव मे है नहीं वह
बाड़ें होती हैं मवेशियों के लिये
सपनों को तो बहुत छोटा है
सारा आकाश भी
डैनों को खोलने के प्रयत्न काम नहीं आते अक्सर
चाहत करती है संचालित सब गतियाँ सारी उड़ाने
सपने नहीं टूटते
मनोबल टूटते हैं
और फ़िर कुछ नहीं बचता
तुममे तो अभी बाकी हो पूरी तुम
तुम्हारे पंख दिखाई देते हैं मुझे
और उदासी भी
नैराश्य है जिसे तुम संतुष्टि कहती हो
तुमने खुद ही बनाये हैं घेरे अपने चारों ओर
सुरक्षा नहीं
ठीक से देखो कैद है
सहनुभुति पा लेने भर का लोभ क्यों
सब पाने की पात्रता तो है तुममे
सब में होती है
बस एक ज़रा तीव्र उत्कंठा
और ज़रा सा हौसला
फ़िर तुम पाओगी कि
चारदीवारी नज़र ही नहीं आती
उन चटकीले रंगों वाले बादलों से
वास्तव मे है नहीं वह

Thursday, 25 February, 2010

कभी तो आयेगा अच्छा भी वक्त

कभी तो आयेगा अच्छा भी वक्त
ख़राब हैं हालात अभी तो बहुत
अभी तो करना पड़ता है बहुत बन्दोबस्त
कि लोग चल सकें सड़कों पर ठीक से
और हाँ
भेड़ बकरियों के बाबत नहीं
इन्सानों के लिये कह रहा हूँ मै
खड़े रहते हैं मुश्तैद दरोगा सिपाही
जैसे कि हम इतने जंगली हैं कि
चल भी न सकें कायदे से अपने आप
अभी तो डंडे के ज़ोर पे ही
रोकनी पड़ती हैं चोरियाँ
मुकाबला किया जाता है डकैतियों का
सज़ा देके समझाई जाती है ये बात
कि बुरी बात है दूसरे का हक़ छीनना
कोशिश की जाती है ज़ोर ज़बरदस्ती से
कि औरतों से ज़ोर ज़बरदस्ती न की जाये
बड़ी मुश्किल से शायद ही कभी
समझ आता हो किसी को
बुज़ुर्गों की इज़्ज़त की जाये
बच्चों को मोहब्बत से पाला जाये
पेड़ पौधों को बचाया जाये
कभी तो आयेगा वो वक्त
जब अदालतें नहीं होगी
नहीं होंगे वकील जज़ और सिपाही
हो जायेंगे हम लायक इतने
कि ज़रूरत हीं नहीं होगी इनकी
कभी तो आयेगा ऐसा भी वक्त
खराब हैं हालात अभी तो बहुत
कभी तो आयेगा अच्छा भी वक्त

Wednesday, 24 February, 2010

फ़िर आता है बसन्त

मै जब मर जाता हूँ
तब तुम ऐसे रोती हो
कि अब बस सब खत्म
लेकिन ऐसा होता नहीं
कुछ जगहें हो जाती हैं खाली
शुरु में अखरती हैं वे जगहें
जैसे जीभ बार बार वहाँ जाती है
जहाँ दाँत अभी अभी टूटा हो
फ़िर पड़ जाती है आदत
तुम्हारे खाने की मेज पर की वो दूसरी कुर्सी
सिनेमा हाल की तुमसे चौथी सीट
रेलगाड़ी में तुम्हारे सामने के ऊपर वाली बर्थ
डबल बेड पर तुम्हारे दांये तरफ़ का तिहाई हिस्सा
कुछ खाली जगहें भर जाती हैं
कुछ की आदत डाल लेती हो तुम
थोड़ी मदद कर देते हैं लोग
और थोड़ी वक्त
और फ़िर धीरे धीरे ये बात
कुछ यूँ हो जाती है जैसे
कड़क ठण्ड मे जब तुम्हारा
तुलसी का बिरवा मर जाता है
तुम नया ले आती हो
बसन्त आते आते

Tuesday, 23 February, 2010

जमीन

वे लोग आये और बोले
यहाँ बनेगी सड़क
मैने कहा ठीक
एक बूढे ने आकर पूछा
क्या वह गेंहू उगा सकता है वहाँ
मैने हामी भर दी
बच्चों ने पढना चाहा वहाँ
मैने इन्कार नहीं किया उसे
जो स्कूल बनाने आया था वहाँ
ढेर सारे मवेशी आये
और घास चरने लगे वहाँ
उन्होने मुझसे कुछ नहीं पूछा
मुझे बुरा लगा क्योंकि
अभी तक सबने पूछा था
लेकिन मैने कोई विवाद नहीं किया
मुझे खयाल आ गया था कि समय हो चुका है
और मुझे अब फ़िर चल देना है अपने रास्ते
उस खाली मैदान के साथ खड़े
इस पेड़ के तले से उठकर
जहाँ मै रुका था
पल भर विश्राम को

Monday, 22 February, 2010

कर्फ़्यू

सब्ज़ी काटते काटते वह उठा
छुरा भोंक दिया उस लड़के के
जिसने घंटी बजाई थी
और जो टोपी पहने था
खून की नदी संसद भवन तक पहुँची
अखबार के दफ़्तर से होकर
पत्रकारों ने स्नान किया आरती की
और भोज की तैयारी में जुट गये
दो गुटों में बँटकर नेताओं ने
मंत्रोच्चार के साथ
एक दूसरे पर फ़ूलों की वर्षा की
बच्चों की छुट्टी हो गई
औरतें खाली और बेपरवाह
कोई ठेलेवाला नहीं गुज़रा कहीं से
बीमार बूढा रात्रि भोजन में
सब्ज़ी न होने से नाराज़ था
और उसने अस्पताल में अनशन कर दिया
नुक्क्ड़ों चौराहों पर
कटी हुई गाजर और मूलियाँ
दुर्गन्ध पैदा करती रहीं
बहुत सी सब्ज़ियाँ कटीं बेमौसम
बहुत से लोग तुरन्त बूढे होकर
भरती हो गये अस्पताल में
यहाँ से बाद में कुछ सीधे स्वर्ग गये
और कुछ घर होकर
किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ा
कईयों ने कहा कि वे प्रभावित हुये
उन्हे भी कोई फ़र्क नहीं पड़ा
फ़र्क ही तो नहीं पड़ता है किसी को कभी भी

Sunday, 21 February, 2010

कलजुगी नेता

ये गलतफ़हमी दूर कर लो कि
अनुयाई चलते हैं नेता के पीछे
केवल दिखता भर है ऐसा
बात कुछ यूँ है कि
नेता की आँखें होती हैं पीछे को
दिखती नहीं हमे ये और बात है
और ये भी कि आगे वाली तो हैं नकली
जैसे हाथी के दाँत
न मानो तो जरा सोचो
कौन नेता ले जाता है आगे
समाज को
देखता ही नहीं आगे को
तो ले कैसे जायेगा आगे
खैर तो मामला ये कि
नेता वो
जो देख लेता है
किधर जा रही है भीड़
और फ़िर चल पड़ता है उसके आगे आगे
मुड़े भीड़ बांये तो बांये दांये तो दांये
अड़चन ही नहीं
आँखें जो हैं पीछे को
तो ये हैं कलजुगी नेता
और कहीं अगर असली हो नेता
क्या पड़ी उसे कोई पीछे है कि नहीं
आगे को आँख है
आगे को देखता है
आगे को चलता है
और तब बढ़ता है
आगे को समाज

Saturday, 20 February, 2010

सुख मे करै न कोय

ईश्वर ने पकड़ लिया हमे
एक छुट्टी वाले दिन
लगे शिकायत करने
याद नहीं करते हो आजकल
दिया बाती भी नहीं जलाते मेरे चौबारे
न भजन न कीर्तन न रतजगा
कथा करवा के पंजीरी भी नहीं बाँटते
अरे कभी दो फ़ूल चढा जाया करो
थोड़ा दान दक्षिणा
भन्डारा वगैरह कर लिये कभी
हो आये तीरथ चार धाम
क्या तुम भी
हाँ नही तो
बिल्कुल ही भुला दिये हमें
अब हम क्या कहें
भगवान हैं
बहुत उमर हो गई है
उन्हे कुछ कहे अच्छा नहीं लगता
लेकिन बात दरअस्ल ये है कि
कोई तकलीफ़ ही नहीं है हमे इन दिनो

Monday, 15 February, 2010

शिकार

इन्सान शेर को मारे तो
शिकार
शेर इन्सान को मारे तो
हत्या
भला क्यों?

Sunday, 14 February, 2010

प्रणय निवेदन

एक दिन मै
किसी पतझड़ में
उठाके वो सारी गिरी हुई पत्तियाँ
पीली सूखी आवाज करती पत्तियाँ
टाँग दूँ पेड़ों पर फ़िर से
सुबह की सुन्दर मन्द बयारों को
बुला के छुपा बैठूँ वहीं कहीं आसपास
सूर्यास्त के समय का वो सुनहरा सागर
तान दूँ ऊपर बनाके छत
टाँक दूँ उसपे सजा सजा के
दूज से पूनम तक के चौदहों चाँद
तारे छुपा दूँ ढेर से पेड़ो के पीछे
बना के शामियाना झरनों के परदों से
तुम्हे बुलाऊँ वहाँ एक शाम
और आते ही तुम्हारे
डोलने लगें हवायें
सूखे पत्तों और झरनो का संगीत
टिमटिमाते हजारों तारे बिखर के
नाचने लगें यहाँ वहाँ
मै लेकर
तुम्हारी पसन्द का वो लाल गुलाब
बैठ घुटने के बल
तुम्हे भेंट कर
प्रणय निवेदन करूँ !
तब भी नहीं ?

Saturday, 13 February, 2010

उसने हाँ कहा होगा

और तो खैर क्या गिला शिकवा अँधेरे से
मलाल ये ज़रूर है कि देख न सके हम
जाने किस अन्दाज़ में उसने हाँ कहा होगा

छलकते हुये पियालों को शर्म आ गई होगी
थरथराते लबों पर तबस्सुम छा गई होगी
परदा नहीं था और वो परदा कर रहा होगा
जाने किस अन्दाज़ में उसने हाँ कहा होगा

रेशमी आरिजों पर रंगे हिना छा गया होगा
वो शोख पत्थर का सनम पिघल रहा होगा
कली सा वो बदन चटक कर गुल बना होगा
जाने किस अन्दाज़ में उसने हाँ कहा होगा

मलाल ये ज़रूर है कि देख न सके हम
और तो खैर क्या गिला शिकवा अँधेरे से

Friday, 12 February, 2010

तुम कहो

सुनी है
खामोश नज़रों से
लरज़ते लबों से
सुर्ख आरिज़ से
गहरी साँसो से
तेज धड़कन से
बात हमने जो
तुम भी तो कहो

Thursday, 11 February, 2010

परिक्रमा

चाँद धरती के लगा रहा है चक्कर
एक आकर्षण से बँधा
घूम रही है धरती
सूरज से बँधी
सूरज परिक्रमा में रत है
एक और महासूर्य के
सब कुछ इस पूरे ब्रह्माण्ड में
है किसी न किसी के आकर्षण में बँधा
और लगा रहा है उसके चक्कर अनवरत
खिंचाव
लगाव
प्रेम
चक्कर
तुम
तुम्हारा कालेज
रिक्शा
मेरी साइकिल
मैं
इस ब्रह्माण्ड से बाहर नहीं हैं

Wednesday, 10 February, 2010

जोड़

दिखता नहीं कि
मेज से जुड़ी है कुर्सी
साथ तो है लेकिन
तो फ़िर जुड़ी है
दिखने का क्या
दिखने से भी परे होते हैं जोड़

Tuesday, 9 February, 2010

बैनीआहपीनाला (VIBGYOR)

बैंगनी से लाल तक
जो रंग हम देख पाते हैं
उसके अलावा भी होता है प्रकाश
छोटी और बड़ी वेवलेन्थ
जो फ़ैली है दूर दूर तक
इन्फ़्रा रेड की ओर
अल्ट्रा वॉयलेट की ओर
इन निम्नतर और उच्चतर उर्जा तरंगो के प्रति
हम हैं बिलकुल अन्धे
बहुत ज़रा से एक स्पेक्ट्रम के अलावा
बाकी जो ढेर सारा प्रकाश हमें नहीं दिखता
क्या उसी प्रकाश स्पेक्ट्रम में
घटित होते हैं
शोषण हिंसा घृणा कुत्सित व्यभिचार
धड़ल्ले से ज़ारी हैं
कालाबाजारी रिश्वतखोरी अपहरण बलात्कार
प्रदूषित होते जाते हैं
सागर हिमशिखर हवायें नदियाँ
और मानव मस्तिष्क
लुप्त होते जाते हैं
दुर्लभ जीव जन्तु वनस्पतियाँ
और संस्कार
यकीनन वहीं
उसी प्रकाश स्पेक्ट्रम में
अन्यथा हम देख न लेते
सामूहिक आत्मघात की ओर
बढ़ती जाती मनुष्यता !

Monday, 8 February, 2010

सेन्स ऑफ़ ह्यूमर

चार माह का नन्हा बच्चा
लेटा लेटा स्वयं मे मस्त
किसी भीतरी खुशी से प्रफ़ुल्ल
हाथ पाँव फ़टकारता
मुट्ठियों को ज़ोर से भींचे
मुस्कराता रहता है मन्द मन्द
विधाता ने बनाने के बाद उसे
जैसे कि चुपके से
सौंप दी हो कोई अकूत सम्पदा
खुलेगीं धीरे धीरे मुट्ठियाँ उसकी
ज्यों ज्यों बड़ा होगा
और फ़िर पायेगा कि
हाथ खाली हैं
मजाक किया था शायद भगवान ने
हो सकता है उनका भी हो
सेन्स ऑफ़ ह्यूमर

Saturday, 6 February, 2010

मेरे बच्चों !

चाहता हूँ तुम्हे दे जाऊँ
सुन्दर सूर्यास्त
चौदहों चाँद
अँधियारी रातों में तारो की महफ़िल
साफ़ नदियाँ सागर
संगीत सुनाते झरने
सुरक्षित जंगल वन्य जीवन
शानदार चीते मतवाले हाथी
नाचते मोरों से भरे वन
पहाड़ों के घुमावदार रास्ते
ढलुआँ खेत
लहलहाती फ़सलें
पेड़ो पर झूले सावन के
शीतल मन्द बयार
झकझोरती आँधियाँ
रिमझिम फ़ुहारें
आम के बौर की मतवाली गन्ध
खुशबू लुटाते गुलाब और बेला
बदलते मौसम की मस्तियाँ
विस्तृत रेतीले बंजर टीले
अगर ये सब बचे
हमारी हवस और मूर्खता से !

Thursday, 4 February, 2010

कबूतर

उस गाँव में
नहीं जानते थे लोग
किसी चिड़िया को
सिवाय कबूतर के
लग गया एक दिन
उनके हाथ
कहीं से उड़ता आया
एक रंग बिरंगा खूबसूरत तोता
परेशान हो गये लोग
देखा नहीं था कभी
इतना भद्दा कबूतर
खैर उसको ठीक करना
उसके ही हित मे था
और ज़रूरी भी
क्योंकि वे दयालु लोग थे
सो
काट दी गई उसकी कलगी
सीधी कर दी गई घिस कर उसकी चोंच
काट छाँट दिया गया परों को
और फ़िर रंग दिया गया
सफ़ेद रंग में उसे
अब चैन आया लोगों को
बन गया कबूतर
जाने कब से हम सब
अपने घरों में
शिक्षा संस्थानो में
बना रहे हैं हर रोज़
कबूतर

Tuesday, 2 February, 2010

ईश्वर

मिला एक दिन
एक शख्स मुझे
जो खुद को
कहता था भगवान
मेरे संशय पर दिखाया
उसने जो पहचान पत्र
उसपर लिखा था
मेरा ही नाम