Tuesday, 26 April, 2011

बोलो विकिलीक्स बाबा की जय!

हर दफ्तर में लूट मची है देश का बज गया बाजा
स्विस बैंको में नोट भर रहे मंत्री हो या राजा
जो कुछ जिसके हाथ लग गया सारा लूट गया
हर नेता और अफसर का अब भांडा फूट गया
बोलो विकिलीक्स बाबा की जय!

पहन के टोपी हाथ जोड़ के घर घर मांगे वोट
हथियाके पावर जनता के पिछवाड़े मारे चोट
ओ भूखे मरने वालों देखो इनको पहचानो
फूल नहीं सर पर इनके अब तो जूते तानो
गांधी के सपनों का भारत तो पीछे छूट गया
हर नेता और अफसर का अब भांडा फूट गया
बोलो विकिलीक्स बाबा की जय!

शर्म नहीं है लाज नहीं है इनका कोई इलाज नहीं है
कैंसर की बीमारी है ये छोटा मोटा खाज नहीं है
देश को अपनी माता कहते नोंच नोंच खाते उसको
गिद्ध जमा हैं संसद में सब देखो चाहे जिसको
सोचो एक कपूत जो अपनी माँ को लूट गया
हर नेता और अफसर का अब भांडा फूट गया
बोलो विकिलीक्स बाबा की जय!

Tuesday, 12 April, 2011

जोर से रोओ तो सही

क्या करते हो जब
तुम्हारे हिस्से का
तीन रुपये किलो वाला अनाज
अफसरों की हवस का बन जाता है आहुति
या दुत्कार कर भगा दिए जाते हो उन स्कूलों से
जहाँ तुम्हारे बच्चे की पढ़ाई का बंदोबस्त होना चाहिए
या उन बड़े अस्पतालों के बाहर ही
दम तोड़ देते हैं तुम्हारे बूढ़े माँ बाप और गर्भवती स्त्रियाँ
कभी भी हड़प लिए जाते हैं तुम्हारे जमीन के टुकड़े
नज़रअंदाज कर दिए जाते हैं तुम्हारे जुड़े हुए हाथ
और उनमे दबी अर्जियाँ
बताओ क्या करते हो तुम
मेरी मानो तो
लगा दो आग उन भवनों में
गिरा दो सब ओहदे ऊँचे
नेस्तनाबूत कर दो ये ताज ओ तख़्त
और गर न बन पड़े ये सब
तो रोओ जोर जोर से
बहाओ सैलाब आँसुओं के
चीखो चिल्लाओ गुहार मचा दो
पटक कर सर अपना
लहूलुहान कर दो देहरियां उनकी
यूँ बैठ कोने में सिसक कर
ज़रा ज़रा रोज मर मर के
बदनाम तो न करो
जिंदगी को

Saturday, 9 April, 2011

वोटर

कुछ लूटते रहे तुम्हारी इज्जत
छीनते रहे तुम्हारी रोटी
जलाते रहे बस्तियाँ तुम्हारी
और कुछ थे जो
मुद्दा बनाते रहे इन्हें
धंधा चलाते रहे अपना
और भी थे कुछ
जिन्होंने खबरों का लगाया बाज़ार
इन सबके यहाँ रहा नोटों का अम्बार
और तुम
चोरी और बेईमानी का शिकार बनते
मरे लावारिस जानवरों की तरह सड़ते रहे
तुम्हारी रंगो में आखिर बहता क्या है
सुनते थे की हाय लगती है गरीब की
जिसका कोई नहीं उसका खुदा होता है
समझ में नहीं आता किस तरह रोता है तू
और अपने खुदा से रोज तू कहता क्या है
तुम्हारी रंगो में आखिर बहता क्या है

Friday, 8 April, 2011

बात बस इतनी सी है

तीर बन लक्ष्य भेद
हुये हर्षित
अहा मै
चूके कभी
भरे विषाद से
अफसोस
रात दिन
सुख दुःख पर झूलते
इतराते बिफराते
आँख होती तो देखते
प्रत्यंचा को
संधान करते हाथों को
होता विवेक तो सोचते
उसके भी पार
और और दूर
जान लेते नियति
समझ लेते विधान
और बस बने रहते
केवल एक तीर
लक्ष्य भेदता
कभी चूकता भी