Friday 24 August 2007

सीधे रास्ते

यूहीं कुंदन नहीं बनोगे
कड़ी आंच मे तपना होगा
उसकी आस छोड़नी होगी
तब जाकर कोई अपना होगा
सिर्फ सब्र से फल न मिलेगा
कुछ लगकर के करना होगा
मंज़िल हरदम दूर रहेगी
ख़ुद उठकर के चलना होगा
सूरज गया अँधेरा देकर
किसी दिए को जलना होगा
सपने सच तो हो जायेंगे
काम मगर कुछ करना होगा
स्वर्ग नही मिलता धरती पर
उसके लिए तो मरना होगा
तुम समझे वह अपना होगा
जागी आँख का सपना होगा
गिरकर भी जो बड़ा हो गया
देख के आओ झरना होगा
गलत राह पर नही किसी से
ख़ुद से मगर तो डरना होगा
जीवन खुशियों से भर जाएगा
प्रेम सभी से करना होगा

8 comments:

  1. This is one of the best poems I have read. I shared it with many friends and all of them thanked me for sharing it with them. Great work.
    Neeraj

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  2. Jeevan Ki Mulbhut baat rakh di kadvee sacchai ke sath.

    Realy very Good. Truth remains truth always and forever.

    Arvind Awasthi

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  3. मंज़िल हरदम दूर रहेगी
    ख़ुद उठकर के चलना होगा
    क्या खूब लिखा है आपने! स्वागत आपका मेरे ब्लॉग पर भी.

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  4. very nice poem
    भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है ।
    लिखते रहिए, लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
    कविता,गज़ल के लिए मेरे ब्लोग पर स्वागत है

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  5. very nice. waah! ब्लोगिंग जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. लिखते रहिये. दूसरों को राह दिखाते रहिये. आगे बढ़ते रहिये, अपने साथ-साथ औरों को भी आगे बढाते रहिये. शुभकामनाएं.
    --
    साथ ही आप मेरे ब्लोग्स पर सादर आमंत्रित हैं. धन्यवाद.

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  6. स्वर्ग नही मिलता धरती पर
    उसके लिए तो मरना होगा

    मन के अन्तर को कागज़ पर उतरने का प्रयास ही अन्तिम सफलता है

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