Wednesday, 14 October 2009

लीला

हर सुबह नया एक जीवन है
शाम सुहानी वादा कल का

हर मौज़ भँवर मे डालेगी
हर माझी नाव डुबोयेगा
डरते हुये तो युग बीता
अब कितना वक्त गँवायेगा
जो होना है सो होगा ही
समझो सब कुछ नाटक ही
अभी जियो ऒर यहीं जियो
जीवन है जीना पल पल का

कोई नही आता ऊपर से
खुद अपना जिम्मा लेलो
भला बुरा सब हाथ हमारे
खुद झन्झावातों को झेलो
पैदल चलते थक जाओ तो
या बैठ रहो या पर लेलो
सुख दुख आते जाते रहते हैं
जीवन नाम इसी हलचल का

हर सुबह नया एक जीवन है
शाम सुहानी वादा कल का

Tuesday, 13 October 2009

और नहीं

एक मुर्दा भविष्य
एक लचर वर्तमान
अभी ठॊर नहीं
राह किसी ओर नहीं
एक जमात मूढ़ों की
बिरादरी गूँगों की
किसी की खैर नहीं
पर ज़रा शोर नहीं
नफ़रत के बीज
दुश्मनी के पेड़
अशान्ति के फ़ल
शराफ़त का दॊर नहीं
ये शोषण लाचारी
गरीबी महामारी
बढती बेरोज़गारी
बस अब ऒर नहीं

Monday, 12 October 2009

हम जो बन सके करते हैं
वो जो मन करे करते हैं

है रोशन किसी से जहाँ
ऒर कुछ यूँही जलते हैं

कुछ को तेरा दर नसीब
बाकी दर बदर भटकते हैं

मस्जिद मे जा बिगड़े हुये
मैखानों मे आ सुधरते हैं

क्यों जीते हैं खुदा जाने
जो न किसी पे मरते हैं

सुन ऎ दिल धीरे से चल
अभी वो आराम करते हैं

Thursday, 8 October 2009

समन्दर की जो प्यास लिये फ़िरते हैं
वो अक्सर पोखरों से फ़रियाद करते हैं

चमन को होगी लहू की ज़रूरत वरना
लोग यूँही कब मुझ को याद करते हैं

तेरे ठिकाने का पता नहीं अभी हमको
सर अपना हर दर पे झुकाया करते हैं

होशियार रहें जो चढ़ने की ठान बैठे हैं
ऊँची जगहों से ही लोग गिरा करते हैं

बन गई है यहाँ मस्जिद मैखाना हटाके
लोग अब कम ही इस तरफ़ गुजरते हैं

क्या क्या गुजरती है हुस्न पर देखिये
खूबसूरत फ़ूल बाजार मे बिका करते हैं

Wednesday, 7 October 2009

सिर्फ़ तस्वीर

मेरे पास तुम्हारी एक तस्वीर है
जो बहुत खूबसूरत है
लेकिन
तस्वीर ही तो है
कुछ खूबसूरत वादे मेरे पास हैं
जो शायद सच भी हों
लेकिन
बातें ही तो हैं
जो शाम ज़ुल्फ़ों की छाँव मे गुजरे
कामयाब ऒर हसीन है
लेकिन
सपने ही तो हैं
हर दर्द जो ये दिल सहता रहा है
चाहे जिसने भी दिये हों
लेकिन
अपने ही तो हैं

Saturday, 26 September 2009

तमन्नाओं के पर कतर दो
आहों को बेअसर कर दो

चलो कर दो रवाना कारवाँ
फ़िर रहजनो को खबर दो

भूखमरी से बच रहे ढीठ
चलो अब उनको जहर दो

जिन्हें दीखता नहीं हुस्न
इश्क की उन्हें नज़र दो

आवाम की भी मानो तो
एक सियासत लचर दो

कन्धें नाजुक हैं लोगों के
हमे घर मे दफ़न कर दो

Friday, 25 September 2009

कुछ काम का नहीं मेरे हुये न तुम
कुछ काम का नहीं मेरे हुये जो तुम

मुद्दतों बैठे रहे हम राह देखते तेरी
ऒर पहलू मे मुद्दतों बैठे रहे हो तुम

रुकते नहीं किसी के लिये ऎ वक्त
क्यूँ मेरे लिये ही ठहर गये हो तुम

कुछ भी मेरा नहीं जब दुनिया में
क्यूँ ऐ दर्द फ़िर मेरे हुये हो तुम

हम अब भी गुनाह करते हैं अदम
यही राह आदमी को दे गये हो तुम

Thursday, 24 September 2009

अब दे दे

कुछ आँसू बहें कुछ बात चले
कुछ बाती बनकर जल जाये
कुछ मोम बने दरिया निकले
कोइ याद बहे कोइ घूँघर बोले
कोइ राग कहे कोइ घूँघट खोले
कोइ गीत सुनाये सुबहों के
कोइ कहीं पपिहा बोले
कोइ लाये सन्देसा कोइ पाती बांचे
कोइ बुलाये कोइ सुलाये
कोइ लोरी गाये कोइ मन का बोले
कोइ आस जगाये कोइ प्यास बढाये
कोइ अपनो का सा अहसास कराये
कोइ छूले दिल के तार सभी
बज़ उठे कोइ सितार कभी
कोइ सपनो को पर दे दे
व्यथा कथा को घर दे दे
कोई सब हो जाने दे
कुछ न कहे बह जाने दे
सब दे दे
रब दे दे
और नही अब इन्तज़ार
अब दे दे
बस रब दे दे

Monday, 21 September 2009

माना कि ज़िन्दगी का हासिल मौत है
ऐसा भी क्या कि अभी से मर जाइये

न कुछ और बन पड़े तो रोइये ज़ार ज़ार
घुट घुट के बेकार क्यों कलेजा जलाइये

सर तो जायेगा अभी नहीं तो फ़िर कभी
कुर्बान जाइये किसी पे क्यों बोझा उठाइये

क्या हुआ दिल टूटा काँच की ही चीज़ थी
किरचों पर इन्द्रधनुष फ़िर नया सजाइये

फ़िर होश मे आने को हैं चाहने वाले तेरे
उठिये सँवरिये निकाब रुख से हटाइये

बात अगर मान जायें वो मेरी एक बार
यही कि एक बार बात मेरी मान जाइये

कुछ नहीं मिलता है आसान राहों पर
मुश्किलें न हों अगर तो लौट जाइये

Friday, 18 September 2009

रस्म निभाने आ पहुँचे
अपने ही जलाने आ पहुँचे
उनको बुलाने दोस्त मेरे
गैर के घर पे जा पहुँचे
मेरे मरने की मुझको
खबर सुनाने आ पहुँचे
मुझसे पहले मेरे चर्चे
उन के दर पे जा पहुँचे
छोड़ आये थे जो चेहरे
मुझे डराने आ पहुँचे
हम तौबा कर बैठे जब
पीने के बहाने आ पहुँचे

Thursday, 17 September 2009

अपना स्वार्थ

ढेर सारे फ़ूल खिले
इस बार मेरे बगीचे मे
भीनी सी खुशबू बिखेरते
लेकिन कोई कैसे भला
अपने ही बगीचे मे
रह सकता है हर वक्त
सो
मैने उठाये खूब सारे फ़ूल
ऒर बाँट आया
गलियों चॊबारों
चॊराहों मैदानो
दुकानों मकानों
अब
मै जहाँ भी होता हूँ
भीनी भीनी खुशबू आती है
हर वक्त.

Tuesday, 15 September 2009

मैं ऒर मैं

तुम मेरे हो
तुमसे लगाव मेरा है
तुम्हारी चाहत मेरी है
तुमसे विछोह मेरा है
उसकी तड़प मेरी है
तुम्हारी आस मेरी है
गहन प्यास मेरी है
तुम्हारे दर्द मेरे हैं
तुम्हारे स्वप्न मेरे हैं
लगाव चाहत विछोह तड़प
आस प्यास दर्द ऒर स्वप्न
से सहमा हुआ ये
गुजरता जीवन मेरा है
अनगिनत रंगीन भावनाओं के
बोझ तले दबकर सिसकते हुये
हॊले से सर उठाकर ये
उभरता गीत मेरा है
आश्चर्य!
इसमे तुम्हारा क्या है!

Thursday, 20 August 2009

उहापोह

तुम हो या कि नहीं हो !
सपने होते हैं ऒर नहीं भी
ऒर ख़याल भी.
मेरे दिन गुज़रते हैं तेरे ख़याल मे
मेरी रातें गुज़रती हैं तेरे सपनो मे
ये दिन ऒर ये रातें
हैं या नहीं !
ऒर अगर नहीं हैं
तो ज़िन्दगी कहाँ है !
तो फ़िर ये क्या है
जो कहीं मेरे भीतर
रह रह के कसमसाता है
घुटता है तड़फ़ड़ाता है
चीखता चिल्लाता है
ऒर ये जान लेना चाहता है
ऎ मेरी ज़िन्दगी !
तुम हो या कि नहीं हो !

मानव विकास

अग्नि धरती जल वायु और आकाश की
गोद मे पलकर एक नन्हा सा बीज
बना विशाल वृक्ष
उससे जन्मे अनगिनत नन्हे बीज
एक एक बीज को फ़िर सँभाला प्रकृति ने
ऒर फ़िर अनगिनत वृक्ष
ऒर अधिक बीज
ऒर ऒर वृक्ष
हर ओर पास पास ऒर दूर भी
हुआ विस्तार ऒर हो गये बहुत बहुत दूर
एक ही कोख से जन्मे।
इस ओर के एक वृक्ष ने बना ली चौपाल
अपने पास के वृक्षों को फ़ुसलाकर
जाने क्यों!
ऎसा ही किया उस ओर के वृक्षों ने भी
उसी वजह से
जाने क्यों!
फ़िर आई एक भयानक अशान्ति
जहाँ है
ढेर सारी कटुता
ढेर सारी निर्दयता
ढेर सारा वैमनस्य
ढेर सारी घृणा
ऒर फ़िर
सड़कों पर मकानों में
मन्दिर में दुकानों में
नदियों पहाड़ों पर
सागर ऒर किनारों पर
बेवजह बहता हुआ
गर्म लाल
जो देखते हो तुम
वो खून है
उस पहले बीज की आत्मा का
जो चीखती चिल्लाती
अपने को नोचती बदहवास
आकाश से पाताल तक
आदि से अनन्त तक
भागती फ़िरती है
एक शान्त कोने की चाह में
जहाँ हो
ज़रा सी ममता
ज़रा सी दया
ज़रा सी सहिष्णुता
ज़रा सा प्रेम।

Monday, 17 August 2009

धूप छाँव

अभी तुम थे अभी नही हो
तुम जो कहते थे
सुबह हर रात की होती है
हर वीराने को घर होना है
तुम जिससे की
जिन्दा थी हसरतें
रोशनी का पता मिलता था
बैरंग से किसी एक ख़त को
जैसे एक मकाँ मिलता था
हवायें फ़ुसलाकर न जाने कहाँ कहाँ
तैयार रहती थीं भटकाने को
हर एक खयालात ने ठानी थी
छोड़ जाने को आशियाने को
तुम जो कि
किस्से सुनाते थे सूरजों के
कि गहराई हुई रात कटे
उम्मीदें जमा होने लगी थीं
आहट सी सुनी थी सुबह की
जीने के लिये फ़िर एक बार
दिल ने कहा था कि आओ चलें
उठके दो कदम और फ़िर देखा फ़िर के
सोचा था कि तुम मिलोगे मेरे पीछे
मुस्कराते हुये और कहोगे कि चलो दौड़ें
तुम जो कहते थे कि मरती नहीं है ज़िन्दगी
कहाँ हो तुम !
अभी तुम थे अभी नही हो
दिल है कि मानता ही नहीं
ऒर ये लगता है
अभी भी तुम हो
और यहीं कहीं हो!

Saturday, 6 December 2008

प्रेम: दो प्रसंग

(१)

ऐसा कि
दीये ही दीये हैं जले हुये
चारों ओर हर रोज़ दिवाली है

ऐसा कि
किसी पाजेब से टकराकर बूँदे
गुनगुनाती हुई आती हैं झमाझम

ऐसा कि
बादलों से उतरी रूई की परियाँ
हर रात सुलाती हैं हौले हौले

ऐसा कि
झिलमिलाते तारों ने पायल बाँध
महफ़िल सजाई है रात भर

बस ऐसा सा प्यार है।

(२)

दर्द बढता है तो
मुस्कराते क्यों हो
मुझे देखकर नज़रें
चुराते क्यों हो
मैं गुनहगार नहीं
फ़िर सताते क्यों हो
क्या मिलता है तुम्हे
मुझे रुलाते क्यों हो
सोचता हूँ इतना
याद आते क्यों हो
युँही कम गम नहीं
और बढाते क्यों हो
प्यार है गुनाह नहीं
इसको छुपाते क्यों हो

Thursday, 4 December 2008

संसार चक्र

कुछ जोड़ हुआ
कुछ टूट गया
कुछ पाया है
कुछ छूट गया
कुछ देख लिया
अनदेखा सा
जो दिखता था
वह दूर हुआ
कुछ बाहर बाहर
खो सा गया
कुछ भीतर भीतर
भर सा गया
वह दिखा नहीं
क्या खूब दिखा
जब दूर हुआ
तब मिल पाया
खुली आँख मे
सपना सा था
बन्द आँख मे
सब जग पाया

Wednesday, 3 December 2008

ठहराव

मैने आँसू बहाये हैं
ज़ोर से भी रोया हूँ
दुनिया देखी है और
अपने मे खोया हूँ

मैं बादल बुलाता हूँ
बिजली चमकाता हूँ
आवाज़ करती बूँदो से
ख़ुद ही डर जाता हूँ

अरमान लुटाता हूँ
सपने सजाता हूँ
बुलबुले तोड़कर मैं
वीरता दिखाता हूँ

लोग आदर करते हैं
मै प्रेरणा बाँटता हूँ
दुनिया के ठहाकों मे
अपने दर्द छाँटता हूँ

दिन के उजाले मे
रोज बदल जाता हूँ
लोग उठा देते हैं
उँचा उठ जाता हूँ

सूरज को विदा कर
चेहरा बदल लेता हूँ
रात के अँधेरे मे
पुतला नजर आता हूँ

खुद को जानने मे
उम्र गुज़ार देता हूँ
मौत से ज़िन्दगी
फ़िर उधार लेता हूँ

तुमने कहा बदल गया
मै वो अब नहीं हूँ
नहीं दोस्त कुछ भी हूँ
मै अब भी वही हूँ

(१९८३ में कलमबद्ध)

Tuesday, 2 December 2008

अब नहीं तो कब!

पाँव तले की चीज़
है सर पे चढी हुई
कुछ धूल हटे दोस्तों
आँधियां उठाओ

अँधेरा बहुत है
काफ़ी नहीं दिये
अब सवेरा हो दोस्तों
सूरज बुलाओ

जलते हैं सीने
प्यास गहरी है
आँसू न बहाओ दोस्तों
सैलाब ले आओ

बहुत हो चुका
अब सोना नहीं है
लोरी न गाओ दोस्तों
रणभेरी बजाओ

Thursday, 13 November 2008

अपने अपने सुकून

भूख और नींद की जद्दोजहद में पड़ा
वो छोटा लड़का सोच रहा था,
(उस वक्त जब पास ही उसकी माँ
एक और छोटे बच्चे को
सूखी छाती से लगाये
किसी फ़िक्र मे नहीं थी
शायद समझॊता कर लिया था
जो है जैसा है उससे)
कि देर हुई और बड़ी बहन नहीं आई।
और अगर रात भर नहीं आई
तो सुबह खाने को ज़रूर मिलेगा
थोड़ा सुकून दे गया ये खयाल।
उसे खयाल भी नहीं हो सकता कि
पुलिस आजकल सख़्त है
और रोज़ छापे पड़ रहे हैं।
समाज की सोच सोच के
सेहत ख़राब सी किये हुये,
(जब डाक्टर ने वजन कम करने की
सख़्त हिदायत दे डाली है)
वे परेशान थे कि
अनाचार की बन आई है
हर ओर है भ्रष्टाचार
पुलिस प्रशासन कुछ नहीं करते
चलो इसको मुद्दा बनायें इस बार
थोड़ा सुकून दे गया ये खयाल।

नदिया चले....

उफ़नती गरज़ती
हौले से कभी तेज़
इधर मुड़कर उधर मुड़कर
पहाड़ों से मैदानों में
दॊड़ती हुइ सागर को
एक नदी
अचानक रोक दी गई
एक बड़ा बाँध
अब!
ये नदी
भर देगी खुद से यहाँ
एक विशाल खूबसूरत सरोवर
इससे मिलेगा खेतों को
ज़रूरत भर पानी जो भरेंगे पेट
मिलेगी बिज़ली मिटेंगे अँधेरे
वैसे नही तो ऐसे
पा लेगी अपना मुकाम।
ये नदी दिखा देगी
सदियों से चले आ रहे
अबाधित दौड़कर
सागर से एक हो जाने के रिवाज़ के अलावा भी
कुछ और भी हश्र हो सकता है
और शायद बेहतर।

Saturday, 8 November 2008

क्या हो गया

आते जाते आवारा बादल चलने को आवाज़ लगाते
उठें मगर जायें कहाँ शहर अँधेरा घर खाली है
कितना खाली कितना सूना हर मन का घर आँगन
कैसे कोई फ़ूल खिले रूखी सूखी हर डाली है

यह मेरा है वह मेरा है इसी भरम मे व्यर्थ जिये
अब सब जब भेद खुला तो बची कोई भी साँस नहीं है
खोलें मुट्ठी या बन्द करें खाली हाथ सदा खाली हैं
तृप्ति मिलेगी इस जीवन मे ऐसी कोई आस नही है

जाने कितने अरमानो से चलने की तैयारी की
जाने को उस पार खड़े कागज़ की भी नाव नहीं है
एक झरोखा सूरज लाये गिरी दिवारें तूफ़ानो को
कहाँ ठौर है तन को अब मन को भी तो ठांव नहीं है

मूरत में वो उतरा तो है होश किसे और समय कहाँ
देवालय में लोग सो रहे क्या हो गया मकानो को
प्रेम नही है दया नही है तेरे मेरे में सब उलझे हैं
घर घर में व्यापार हो रहा क्या हो गया दुकानो को

अरे अरे मे बीते जाते अहा अहा के सारे पल छिन
कितने सपने रोज़ बिखरते अब होश में आना होगा
कैसे पाए कोइ उसको उसका कोई गाँव नहीं है
बाहर बाहर भटक लिये अब अपने भीतर आना होगा

Friday, 7 November 2008

वह आता है

सूखे पत्तों की तरह
ना कि जमीन के सीने को
जकड़े हुए जड़ों जैसे
मिलो उसे
तो उड़ा लिये जाओ
जब वह आता है
मन्द् हवाओं में।

धूल के नन्हें कणो जैसे
ना कि सिर्फ़ पड़े हुए
भारी पत्थर की तरह
मिलो उसे
तो बहा लिये जाओ
जब वह आता है
बर्खा फ़ुहारों में।

पानी भर हो रहो
तो ले जाये उड़ाकर
जब वो आग में आये
मस्ती में भर रहो
तो सराबोर कर दे
जब वो फ़ाग मे आये।

वो आता है तो यूँ
कि फ़ूलों मे सुवास आये
कि दिन मे रोशनी आये
कि तारों भरी अमावस
कि बाग मे मधुमास आये
या कि यूँ
कोई नन्हा बच्चा
खिलखिला के हँस दे बेवजह।

रात कहीं दूर वीराने में
अपने प्रियतम को
पपीहा आवाज लगाये।

वो आता है
और कभी शोर में
कभी सन्नाटे में
कभी धीरे से
और कभी तेज।

तुम बस तैयार मिलो और
वो पार करा दे।
इसके सिवा कोई चारा नहीं है
और कभी नहीं रहा।

Thursday, 6 November 2008

एक दिया छोटा सा

कहते हैं कि वेदों में ब्रह्म को परिभाषित करने वाले चार महावाक्य हैं यानि सत्य के शुद्धतम वक्तव्य। एक है "अहम् ब्रह्मास्मि", जो कि जगत विख्यात है। सामवेद के छान्दोग्य उपनिषद में ऐसा ही एक और महावाक्य है "तत्वमसि"। इसका हिन्दी अनुवाद है - "तू वह है" ।

तो... मैं ब्रह्म हूँ , तू ब्रह्म है। यह ब्रह्म है, वह ब्रह्म है। मैं और तू, यह और वह, सब एक है - और सब ब्रह्म है। यहाँ उसके सिवा और कुछ है ही नहीं, कुछ और होने का उपाय ही नहीं है। मजा ये है कि ब्रह्म को ही नहीं पता कि वह ब्रह्म है। मुझे लगता है कि कि ये जान लेना कि यहाँ सब ब्रह्म है, बहुत सुकून की बात होगी। लेकिन मान लेने से बचना होगा। और बहुत कोशिश करनी होगी क्योंकि ये मान लेने का मन तो बहुत करता है।

जाना गया है या कि माना गया, इसकी कसौटी क्या है? मै समझता हूँ कि सुकून कसौटी है। यानि अगर जीवन में सुकून हो तो ही समझना होगा कि जान लिया गया है।

मेरी प्रार्थना है इस अस्तित्व से कि सब के जीवन में सुकून हो। मेरा विश्वास है कि ये हो सकता है क्योंकि मै अस्तित्व के प्रति पूर्ण आश्वस्त हूँ और ब्रह्म में श्रद्धा रखता हूँ।

Thursday, 23 October 2008

और और बार

न हुए न सही पूरे
फ़िर नए ख्वाब बुनें

हम कहें तो कैसे कहें
वो सुनें तो क्यों सुनें

बहुत हो गई मसीहाई
अब हम आदमी बनें

मिले तो जिंदा यहाँ
सिर्फ़ दो चार जने

चली कि कटी जुबाँ
क्या कोई बात बने

वो इधर देख्नने लगे
अब हम दिन गिनें