Wednesday, 5 May, 2010

नाम

पहले पूछता था कोई
कि कौन हो तुम
झट से बता दिया करता था नाम
समय के चलते
जुड़ता गया बहुत कुछ
नाम के साथ
कभी तमगे
कभी कालिख
बोझ बढ़ता गया
खो गया नाम कहीं भीड़ मे
फ़िर कौन के जवाब मे
देने लगा मै
जमा किये गये
कभी तमगे
कभी कालिख
एक एक करके
और फ़िर जब चुक गया सब कुछ जमा
तो पाया कि मेरा नाम
कहीं गुम है

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