Saturday 18 June 2011

हवा का धंधा

हवा खींचते थे भीतर
और कर देते थे बाहर
कभी पेट पिचकावें कभी गाल
सुबह अकेले घर में
कभी साथ साथ पार्कों में
और कभी बड़े जलसों में गांधी मैदानों में
ये धंधा था उनका कुल जमा
सीधा साधा साफ़ सुथरा
सब ठीक ठाक था कि एकदिन
उनने भीतर खींची तो हवा
लेकिन उगलने लगे आग
न जाने क्यों
हो सकता है कि दिमाग में इधर उधर कहीं
गलत जगह घुस गई हो हवा
हवा का क्या है कहीं भी घुस जाती है
खैर जो वो निकली आग तो फ़ैल गई
और जलाने लगी घास और जंगल
भेड़ें हुई परेशान
गडरियों के धंधे में हुआ दखल
उनने उठा लिए डंडे और मचा दिया दंगल
आनन फानन में मामला रफा दफा
अच्छे अच्छों की निकल गई हवा
बोलो सियावर राम चंद्र की ........

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