Saturday 2 July 2011

जिस काफिर पे दम निकले

है तो इक दोस्त मेरा वो
दुश्मनी का मजा देता है
जान लेता है नजरों से
फिर जीने की दुआ देता है
अपनी पलकों से छूकर
जिस्म को रूह बना देता है
सर्द सी आह सीने में
तबस्सुम से उठा देता है
और फिर दहकते शोले
मेरे होठों पे सजा देता है
छीन लेता है होशोहवास
तोहमत सी लगा देता है
खुशनुमा रातों में अब भी
वो जख्म मजा देता है
है तो इक दोस्त मेरा वो

No comments:

Post a Comment