Wednesday 5 October 2011

मेरे बगैर

सुना है जबसे मेरे बगैर वो रह नहीं सकते 
तबसे शहर के लोग हमसे खुश नहीं रहते
जो मेरी एक झलक पाने को भी तरसते थे
आंहें भरते थे कसम खाते थे और तडपते थे 
दीवाना समझते हैं हँसते है और चले जाते हैं
अब वे लोग मेरे पास दो घड़ी भी नहीं रहते
सुना है जबसे मेरे बगैर वो रह नहीं सकते 
पहले पहल तो मेरा दिल जार जार रोता था
सबकी बेदिली से दामन तार तार होता था 
जी में हो तो रो लेते हैं कभी चुप बैठ रहते हैं  
अपने इस हाल पर अब हम कुछ नहीं कहते
सुना है जबसे मेरे बगैर वो रह नहीं सकते 
ज़रा ठेस पे दिल कांच का टूट जाये तो क्या 
न अगर रोये तो कोई आखिर करे भी क्या 
लोगों को ये गुमान है कि वे सख्त दिल हैं 
आँसुओं को अफ़सोस है कि बह नहीं सकते
सुना है जबसे मेरे बगैर वो रह नहीं सकते 
किसी को कोई भला किस तरह भुलाता है 
अपने ही दिल से आखिर कैसे दूर जाता है 
ये तो जिस पे गुज़रती है वही समझ पाता है 
हम अगर चाहें भी तो खुद कह नहीं सकते 
सुना है जबसे मेरे बगैर वो रह नहीं सकते 

1 comment:

  1. बढ़िया पंक्तियाँ ,बढ़िया भाव
    दीपावाली की हार्दिक शुभकामनाये

    ReplyDelete