Thursday 8 October 2009

समन्दर की जो प्यास लिये फ़िरते हैं
वो अक्सर पोखरों से फ़रियाद करते हैं

चमन को होगी लहू की ज़रूरत वरना
लोग यूँही कब मुझ को याद करते हैं

तेरे ठिकाने का पता नहीं अभी हमको
सर अपना हर दर पे झुकाया करते हैं

होशियार रहें जो चढ़ने की ठान बैठे हैं
ऊँची जगहों से ही लोग गिरा करते हैं

बन गई है यहाँ मस्जिद मैखाना हटाके
लोग अब कम ही इस तरफ़ गुजरते हैं

क्या क्या गुजरती है हुस्न पर देखिये
खूबसूरत फ़ूल बाजार मे बिका करते हैं

2 comments:

  1. अब क्या कहें सिवा इसके कि,
    आप तो कलम में ही इक दुनिया आबाद लिये फ़िरते हैं..

    बहुत खूब अरविंद जी ..लिखते रहें

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  2. बन गई है यहाँ मस्जिद मैखाना हटाके
    लोग अब कम ही इस तरफ़ गुजरते हैं


    Kya baat hai! Bahut khub.

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