Monday 18 July 2011

सैनिक से

सरहदों की हिफाज़त करने वालों
तुम जिन झूठी लकीरों की खातिर
अपना खून पानी की तरह बहाते हो
उसके बदले में तुम्हारे बूढ़े बाप को
पानी की एक बोतल भी नहीं मिलती
तांबे  के जिन टुकड़ों को तमगों जैसे
बड़े फक्र से तुम छाती पर सजाते हो
उनको बेचकर तुम्हारे छोटे बच्चे को
चवन्नी भर चूरन तक नहीं मिलता 
जो तुम्हारी मौत को शहादत कहते हैं
वे तुम्हारी लाश पर सियासत करते हैं
वे तुम्हारे नाम पर फहराते तो हैं झंडा 
नज़र में उनकी होता है मगर वो डंडा 
जिसके दम पे वो तुम्हारे भाइयों और
बहनों का तबीयत से चूसते हैं खून 
पीने को सिर्फ आँसू और खाने को गम 
केवल यही मिलता है उनको दोनों जून 
तुम मजारों पर मेलों का ख़्वाब देखते हो 
तुम्हारी बेवा चंद ठीकरों को तरसती है
तुम अपने बाकी निशाँ का फक्र करते हो
ज़िंदा निशानी तुम्हारी दर दर भटकती है 
जिन चंद लोगों के हाथों का खिलौना 
बनके बेकार में गंवाते हो अपनी जान
उनकी जालसाजियों को ठीक से जानो 
करो तो ज़रा उनके ईमान की पहचान 
कागज़ के नक्शों पर खींच कर लकीरें 
तुमको मोहरे बनाकर बाज़ी बिछाते हैं
हथियारों के ज़खीरे की दुकाने सजाकर 
वे तुम्हारी मौत का सामान जुटाते हैं 
हम सब पर चढ कर राज करने के लिए 
उन्होंने खींची हैं जो ये लकीरें नकली 
ज़रा देखो तो सही वे कहीं हैं जमीं पर
जिनके लिए तुम बहाते हो खून असली 

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