Thursday, 13 September, 2012

फिर सही

रोज सुबह आँख खोलते ही 
आसमान की चुनौती 
उत्साहित करती है 
उसकी विस्तृत नीरवता पुकारती है 
आगे आगे भागते  
पीछे मुड़कर मुस्कराते हुए 
हाथ के इशारे से साथ बुलाते 
किसी बचपन के दोस्त सा 
एक शुभ्र बादल का टुकड़ा 
कहता है चले आओ 
डैने खोलता हूँ 
पर तोलता हूँ 
निकलना है अनंत की यात्रा पर 
पेट में कुछ तो दाना चाहिए 
खोज में निकलता हूँ 
बीत जाता है दिन उसी में 
लौटने लगते हैं परिन्दे  
गहराने लगती है रात 
डैने समेट लेता हूँ 
आँखों में नींद के साथ साथ 
उतरने लगता है 
सुबह उठकर 
एक और प्रयत्न का स्वप्न 

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