Friday 2 April 2010

रेत के महल

सागर तट पर तन्मयता से
रेत के महल बनाते बच्चे
बस यूँही खेल है उनको
साँझ होते होते
घर लौटने का समय
खूब मस्ती में
रौंदते मिटाते
वही रेत के महल
बस यूँही खेल है उनको
प्रयोजन रहित
निष्पत्ति विहीन
बस यूँही है
फ़ूलों का खिलना
झरनो का गिरना
नदियों का बहना
हवाओं का चलना
पशुओं की भाग दौड़
सूरज चाँद सितारे
जीवन है निष्प्रयोजन
प्रफ़ुल्लता है हर ओर
दुखी है
सिर्फ़ और सिर्फ़ मानव
जाने क्यों

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