Wednesday 24 February 2010

फ़िर आता है बसन्त

मै जब मर जाता हूँ
तब तुम ऐसे रोती हो
कि अब बस सब खत्म
लेकिन ऐसा होता नहीं
कुछ जगहें हो जाती हैं खाली
शुरु में अखरती हैं वे जगहें
जैसे जीभ बार बार वहाँ जाती है
जहाँ दाँत अभी अभी टूटा हो
फ़िर पड़ जाती है आदत
तुम्हारे खाने की मेज पर की वो दूसरी कुर्सी
सिनेमा हाल की तुमसे चौथी सीट
रेलगाड़ी में तुम्हारे सामने के ऊपर वाली बर्थ
डबल बेड पर तुम्हारे दांये तरफ़ का तिहाई हिस्सा
कुछ खाली जगहें भर जाती हैं
कुछ की आदत डाल लेती हो तुम
थोड़ी मदद कर देते हैं लोग
और थोड़ी वक्त
और फ़िर धीरे धीरे ये बात
कुछ यूँ हो जाती है जैसे
कड़क ठण्ड मे जब तुम्हारा
तुलसी का बिरवा मर जाता है
तुम नया ले आती हो
बसन्त आते आते

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