Sunday 14 February 2010

प्रणय निवेदन

एक दिन मै
किसी पतझड़ में
उठाके वो सारी गिरी हुई पत्तियाँ
पीली सूखी आवाज करती पत्तियाँ
टाँग दूँ पेड़ों पर फ़िर से
सुबह की सुन्दर मन्द बयारों को
बुला के छुपा बैठूँ वहीं कहीं आसपास
सूर्यास्त के समय का वो सुनहरा सागर
तान दूँ ऊपर बनाके छत
टाँक दूँ उसपे सजा सजा के
दूज से पूनम तक के चौदहों चाँद
तारे छुपा दूँ ढेर से पेड़ो के पीछे
बना के शामियाना झरनों के परदों से
तुम्हे बुलाऊँ वहाँ एक शाम
और आते ही तुम्हारे
डोलने लगें हवायें
सूखे पत्तों और झरनो का संगीत
टिमटिमाते हजारों तारे बिखर के
नाचने लगें यहाँ वहाँ
मै लेकर
तुम्हारी पसन्द का वो लाल गुलाब
बैठ घुटने के बल
तुम्हे भेंट कर
प्रणय निवेदन करूँ !
तब भी नहीं ?

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