Friday 10 August 2012

जय श्री कृष्ण

सुन्दर रेशमी वस्त्रों आभूषणों से सज्जित

होठों पर बाँसुरी बगल में प्रेमिका

नृत्य की मुद्रा चेहरे पर आनंद

मानो कह रहा है

जियो मौज से मस्ती से भरपूर

घी मक्खन खाओ

न बन पड़े तो चुरा के

प्रेम रास रंग गोपियाँ उपवन

सखा उत्सव नदी पेड़ वन

छेड़छाड़ मनुहार दुलार

दैनिक जीवन का हिस्सा बने

आन्नद में जियो आनन्द बाँटो

सर पे आ पड़े तो लड़ भी लो

न मौका हो अनुकूल तो

रणछोड़ दास जी हो जाओ

पूरा जीवन चरित

चीख चीख के साफ़ साफ़

बता रहा है कि परिपूर्ण जी लो

ऐसा भी क्या डर मौत का

कि जी न सको

ऐसे मस्त मौला मनभावन रसिया

उल्लास की प्रतिमूर्ति के समक्ष

हम खड़े हो जाते हैं

मूढ़ करबद्ध याचक

कांपते पाँव

चेहरे पर घनघोर अवसाद

होठों पर घिघियाहट लिए

क्या ये घोर अपमान नहीं है

परमात्मा का ?

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