Tuesday, 6 September 2011

विशेषाधिकार

चलो माना कि बुरी लगती हैं गालियाँ 
लेकिन गोलियों से फ़िर भी बेहतर हैं
यहाँ करोड़ों लोगों को गालियाँ खाके रोटी तक नहीं मिलती 
रोटियों कि खातिर खाते हैं न जाने कितने यहाँ पर गोलियाँ 
जहाँ लोगों का ये अधिकार है मौलिक 
कि इतना मिले उन्हें कि वो जी तो सकें कम से कम 
उनमे से ज्यादातर को रोज भरपेट रोटी सूखी तक नहीं है 
अपने बीमार बच्चों औरतों और बूढों को ले जाएँ 
उन अस्पतालों में जहाँ अधिकार है उनका 
उनकी हिम्मत तक नहीं होती उस ओर झाँकने की
सडक पर प्रसव को मजबूर गरीब औरतें 
बजबजाती नालियों से बीन कर पेट भरने की कोशिश में
हमारे देश का नन्हा मासूम भविष्य
ख़ुदकुशी को मजबूर हमारे अन्नदाता 
दुत्कार दिए जाते हमारे शहीदों के परिजन 
कहाँ हैं उनके जीने के अधिकार 
क्या उनका हिस्सा नहीं है उस जमीन के टुकड़े पर
जिसको खोदकर निर्दयता से चंद लोग 
सब तरह के ऐश और आराम जुटाते हैं
या जगमगाती ऊँची इमारतें बनाकर 
रात रात भर महफ़िलें सजाते हैं 
वहीं बाहर ठण्ड में न जाने कितने दम तोड़ देते हैं 
दाने दाने को मोहताज करोड़ों लोग 
जब इस व्यवस्था में रह जाते हैं अनपढ़ 
और बने रहते हैं लाचार पशुओं से भी बदतर 
तुम इनकी बेबसी पर करते हो सियासत 
लूटते खसोटते रहते हो इनकी हड्डियाँ और चूसते हो खून 
खाते उड़ाते रहते हो इनके हिस्से का सरे आम लूट कर
और इस बेबसी लाचारी असहायता से क्षुब्ध होकर
निकल जाये किसी के गले से तुम्हारे लिए अपशब्द  
तो तुम्हारे विशेषाधिकार का हनन हो गया 
तुम्हे ये विशेष अधिकार दिया किसने
क्यों है ये विशेष अधिकार तुम्हारे पास
जिन नियम कानूनों के तहत 
तुम अपने इस विशेषाधिकार का रोना रोते हो 
उन्ही के तहत ये जिम्मेदारी तुम्हारी है कि 
लोगों के साधारण अधिकारों की तो रक्षा हो कम से कम 
जब तक नहीं होता ऐसा
तुम किस मुंह से करते हो अपने विशेष अधिकार की बातें 
कुछ तो शर्म खाओ 
इन छुद्र बातों पर व्यर्थ समय गंवाकर 
और गुमराह तो न करो जनता को 
यदि तुम सचमुच अपने विशेष अधिकार पर गर्व करते हो 
तो उसे कमाओ अपने आचरण से कृत्यों से 
ना कि छीनने कि कोशिश करो डंडे के जोर पे 
अब बाज आओ छीनने झपटने चुराने और जोर जबरदस्ती से  
वक्त आ गया है कि ठन्डे दिमाग से सोचो 
ज़रा आराम करो 
और तुम्हे जिस काम के लिए हमने नियुक्त किया है 
सिर्फ वही काम करो 

Friday, 2 September 2011

दिल्ली की नज़र से

गाँव को देखो कभी दिल्ली की नजर से
बेहतर इनको पाओगे किसी भी शहर से 
भूखा वहाँ अब एक भी इंसान नहीं है
गरीबी से आज कोई परेशान नहीं है
बीड़ी दारु की एक भी दूकान नहीं है
जान खुद की लेता किसान नहीं है 
ऐसा हमने जाना है टीवी की खबर से
गाँव को देखो कभी दिल्ली की नजर से
मिलता है सबको पीने को साफ़ पानी 
मजबूरी अब नहीं है रोटी सूखी खानी 
स्कूल पढ़ने जाती है गुड़िया सयानी 
तंदुरुस्त हैं बच्चे बूढ़े स्वस्थ हैं नानी
कोई नहीं मरता है यहाँ शीत लहर से 
गाँव को देखो कभी दिल्ली की नजर से
लहलहाती फसलें हैं गोदाम भरे हैं
लदे पेड़ फल फूलों से मैदान हरे हैं
बिजली सडक स्कूल अस्पताल है 
गाँव गाँव इस देश का खुशहाल है 
औरतें महफूज़ हैं अब जोर जबर से
गाँव को देखो कभी दिल्ली की नजर से

Tuesday, 30 August 2011

ऊपर

पहाड़ के सर चढ़कर बैठा है बन के बर्फ
बैठा रह सकता है सदियों वहीं जम के
लेकिन अगर और ऊपर जाना हो तो
पिघलना होना जिद छोड़
बहना होगा नीचे 
उबड़ खाबड़ पत्थरों पर
उनसे लड़ते हुये उनको बदलते हुये
राह बनानी होगी आडी तिरछी ही सही
ढोनी होगी गन्दगी 
जूझना होगा मौसमों से 
विलीन कर देना होगा स्वयं को सागर में 
और फ़िर जब सूर्य रश्मियाँ पुकारें
निमंत्रण उनका सहर्ष स्वीकार कर 
मिट कर हवा हो जाना होगा 
तब वे ले जायेंगी वहाँ ऊपर 
शिखरों से भी ऊपर 
जहाँ है स्वच्छंद विचरण 

Wednesday, 24 August 2011

मीडिया

ये वो शख्स है बेहया 
जब पड़ती है इसके पिछवाड़े 
तो सोहरा लेता है कोने में जा के 
और फ़िर खीसें निपोर के
डुगडुगी बजाये लग जाता है वहीं
देखो देखो दिल्ली का कुतुबमीनार देखो ....
बरेली का मीनाबाज़ार देखो.....
बम्बई शहर की बहार देखो.....
पार्लियामेंट की जूतमपैजार देखो.....
तमाशा देखो.....
पैसा फेंको....

Monday, 22 August 2011

दुनिया मेरे आगे

गीली गीली सी महकती रात
लुकते छिपते दोना भर सितारे
मटरगस्ती करते आवारा बादल
रुनझुन बूँदों की स्वर लहरी 
पत्तों को छेड़ती सावनी बयार 
देर तक मासूम पूनम का चाँद 
कल रात जब वहाँ खेल रहा था
यहाँ इस तरफ इसी दुनिया में 
भूख से हारतीं उम्मीदों और 
सपनों को रौंदते यथार्थ में 
जालसाजियों से पलंग सजाकर
तरक्की की सीता के साथ 
सुहागरात के सपने देखता था
तंत्र और व्यवस्था का रावण 
कोई पूछता था हमसे कि 
तुम्हारी आँख में आंसू और
होठों पर मुस्कराहट एक साथ 
तभी सामने सड़क पर नारे 
और भीड़ की उत्तेजना पर
जोर से आ गई हंसी और 
एक सवाल उठा जेहन में 
ऐसा ही तो होता रहा होगा
पहले भी ग़ालिब के समय 
जब भीतर से निकलता था 
होता है शबोरोज़ तमाशा .........

Saturday, 20 August 2011

आज की ताज़ा खबर

बहुत दिनों से नहीं मिला था मौका इनको चुराने को
और सामने गली के उस तरफ वाले 
खूब हो रहे थे मोटे खा खा के चोरी का माल
इनमे कुछ थे नए नए लौंडे 
खाते जाते थे तर माल दिखा दिखा के
और मुंह भी चिढावें साथ साथ 
खूब करें हंसी ठट्ठा 
आखिर लौंडे जो ठहरे
बानर बालक एक समाना....
समझाया भी होगा बड़े बुजुर्गों ने 
भईया छुपा के खाओ 
न माने तो न माने
बहुत चिढ गए इस तरफ वाले
तो मचा दिए हल्ला एक दिन
इकठ्ठा हो गए सब जनता कालोनी वाले
लगे चीखने जोश में 
अरे ये देखो हमारे फ्रिज की आइसक्रीम.....
इसको देखो ससुरा हमारे चौके से ले आया है आलू.....
हमारी ठिलिया के केले लगते हैं ये तो......
देख इस बंदरिया को 
पहने है पेटीकोट चुरा के हमारे आँगन से........
साइकिल की घंटी चुरा के खेल रहे हैं लौंडे......
वैसे तो दुमदार ठहरे कालोनी वाले
लेकिन अबकी आ गया दम साथ में सबके
उठाके डंडे जो दौड़े 
तो चुरवे सब लगे गुहार मचाने उस तरफ वाले
कहें इधर वालों से कि भईया
आओ हम सब चुरकट मोहल्ले के लोग मिल जाएँ
और बजा दे बैंड जनता कालोनी का
लेकिन मुकर गए सब इस तरफ वाले चुरवे
भरे बैठे थे खूब
और फ़िर जो घमासान मचा 
सो देख ही रहें हैं आप लोग सब

Friday, 19 August 2011

रिटर्न ऑफ द रावण

अभी अभी पता चला है 
राम ने वध किया था जिस रावण का
वो दरअसल क्लोन था उसका
असली वाला तो हो गया था अंडरग्राउंड 
खूब फला फूला
इतना कि समा नहीं सका लंका में 
और फ़िर एक दिन कूद के आ पहुंचा इस पार 
बढते बढते फ़ैल गया सब तरफ 
इस पुण्यभूमि भारत में
अब वो लगा है अपनी दुष्टता में
खा डालता है खेत के खेत 
नोंच खसोट डालता है बस्तियाँ
आग लगाता घूमता है हर ओर
हमारे चूल्हों में डाल जाता है पानी 
अट्टहास करता सुना जाता है राजधानियों में
मुंह चिढाता है टीवी पर अक्सर
सड़कों पर खेलता है कबड्डी 
मजाक उड़ाता रहता है व्यवस्था का
धज्जियां उड़ा डाली हैं नियम क़ानून की
पड़ोस के गुंडों को देता है शह 
जो यहाँ आके मचाते हैं उत्पात
जीना कर रक्खा है हराम 
अब तो आये कोई राम 
और हाँ 
बापू से नहीं होगा काबू
धनुष वाले राम चाहिए अब तो 

Thursday, 18 August 2011

दास मलूका कह गए सबके दाता राम

पंछी करे न चाकरी अजगर करे न काम
सत्य वचन है भाई
अब देखो हमारे देश में आजकल
कुछ हैं जो अजगर की तरह 
छीन झपट जोर जबरदस्ती से 
भर लेते हैं पेट 
और बाकी 
जिनकी औकात नहीं है ऐसा करने की 
टूंगते रहते हैं चिड़िया जैसे जो मिल जाये
अगर मिल जाये 

Saturday, 23 July 2011

अकल बड़ी या भैंस

भैंस नहीं पूछती
अक्ल बड़ी या इन्सान
अक्ल भी नहीं पूछती
ऐसे तात्विक प्रश्न

Thursday, 21 July 2011

प्रगति

हमने की है
बहुत तरक्की 
पिछले दो सौ सालों में
हम करेंगे
और भी तरक्की
अगले दो सौ सालों में
बचे रहे अगर तो

Tuesday, 19 July 2011

वहम

वहम सबको आज़ादी का है मगर
हर कोई यहाँ सीखचों के उस पार है
मिली है किसी को उम्र कैद की सजा
और कोई तो सूली पर खड़ा तैयार है
घुटने लगा है दम अब इस चमन में
बासी हो चुकी है हवा बदलनी चाहिए
बन सकती है जरूर जन्नत ये जमीं 
ये जमीन जन्नत बननी ही चाहिए
बहुत गहरा चली है ये सियाह रात  
अब बस इक नई सुबह की दरकार है
वहम सबको आज़ादी का है मगर
हर कोई यहाँ सीखचों के उस पार है
ज़िंदगी गीत गाती नाचती फिरती हो
बस हर तरफ हों जगमगाते उजाले 
जहाँ सांस लेने पर पाबंदियां न हों 
और न हों दिल कि धडकनों पर ताले
इंसान की सेहत को आज़ादी चाहिए
इस वक्त तो लेकिन आदमी बीमार है
वहम सबको आज़ादी का है मगर
हर कोई यहाँ सीखचों के उस पार है
आम आदमी की बुरी हालत हो गई है 
और इंसानियत किस तरह लाचार है
जो कुछ कर सकते हैं उनके लिए तो
भूख और गरीबी भी महज व्यापार है
चील कौवों की तरह नोंचते फ़िर रहे
ऐसी शासन व्यवस्था को धिक्कार है
वहम सबको आज़ादी का है मगर
हर कोई यहाँ सीखचों के उस पार है

Monday, 18 July 2011

सैनिक से

सरहदों की हिफाज़त करने वालों
तुम जिन झूठी लकीरों की खातिर
अपना खून पानी की तरह बहाते हो
उसके बदले में तुम्हारे बूढ़े बाप को
पानी की एक बोतल भी नहीं मिलती
तांबे  के जिन टुकड़ों को तमगों जैसे
बड़े फक्र से तुम छाती पर सजाते हो
उनको बेचकर तुम्हारे छोटे बच्चे को
चवन्नी भर चूरन तक नहीं मिलता 
जो तुम्हारी मौत को शहादत कहते हैं
वे तुम्हारी लाश पर सियासत करते हैं
वे तुम्हारे नाम पर फहराते तो हैं झंडा 
नज़र में उनकी होता है मगर वो डंडा 
जिसके दम पे वो तुम्हारे भाइयों और
बहनों का तबीयत से चूसते हैं खून 
पीने को सिर्फ आँसू और खाने को गम 
केवल यही मिलता है उनको दोनों जून 
तुम मजारों पर मेलों का ख़्वाब देखते हो 
तुम्हारी बेवा चंद ठीकरों को तरसती है
तुम अपने बाकी निशाँ का फक्र करते हो
ज़िंदा निशानी तुम्हारी दर दर भटकती है 
जिन चंद लोगों के हाथों का खिलौना 
बनके बेकार में गंवाते हो अपनी जान
उनकी जालसाजियों को ठीक से जानो 
करो तो ज़रा उनके ईमान की पहचान 
कागज़ के नक्शों पर खींच कर लकीरें 
तुमको मोहरे बनाकर बाज़ी बिछाते हैं
हथियारों के ज़खीरे की दुकाने सजाकर 
वे तुम्हारी मौत का सामान जुटाते हैं 
हम सब पर चढ कर राज करने के लिए 
उन्होंने खींची हैं जो ये लकीरें नकली 
ज़रा देखो तो सही वे कहीं हैं जमीं पर
जिनके लिए तुम बहाते हो खून असली 

Friday, 15 July 2011

अधर्म युद्ध

अमन के साथ लहू को बहा ले गई बारिश
बेवा का मुस्तकबिल आंसुओं में बह गया
किसी के बुढापे का सहारा टूटा चटक कर 
किसी के ख़्वाबों का खण्डहर ढह गया 
जुगनू फूल तितलियाँ थीं दुनिया उसकी 
बच्चे की ज़िंदगी में भला क्या रह गया
सफ़ेदपोशों को सियासत का मुद्दा मिला
तमाम मासूमों की ज़िंदगी से रंग बह गया 
फिर गुमराह कर दिए गए कुछ नौज़वान 
फिर ज़माना हैवानियत पे हैरान रह गया
कैसा वक्त है कि किताबें खंजर बन गईं हैं 
बजाये ज्ञान गंगा लहू का दरिया बह गया
इंसानियत ने अपना ही खून कर डाला
ये वार भी खुदा खुद अपने पे सह गया

Tuesday, 5 July 2011

हमारे दिलफ़ेंक सर जी

पश्चिमी दिल्ली के भीड़भरे
एक रिहायशी इलाके के
अन्दर की तरफ़
किसी तंग गली में
था एक दफ़्तर
जहाँ काम करते थे
एक हमारे सर जी
हमारे दिलफ़ेंक सर जी
जब तब फ़ेंक देते थे दिल सामने
कन्या हो या महिला
विधवा या परित्यक्ता
सर्व धर्म समभाव रखते थे वे
न उम्र देखें न रंग
बस जरा वो सब हो वहाँ वहाँ बदन में
जिसके होने से होती है कोई नारी नारी
और ज्यादा ज्यादा हो
लेकिन न भी हो तो भी ठीक
जब तक कि पता है नारी है
खैर जरूर बहुत लुभाता सा रहा होगा
उनका दिल
क्योंकि उठा ही लिया जाता था अक्सर
अबके जिन मैडम ने उठा लिया था उसे
मरुती मे आती थीं चला के
बाहर मेन रोड तक गलियों से निकलकर
आटो मिलने की जगह तक
सर जी को दिया करती थीं लिफ़्ट
वे उनको चुम्बन किया करते थे गिफ़्ट
देर शाम हो जाये जब अँधेरा
रोशनी से नहा जायें सड़कें गलियाँ
मैडम अपना गिफ़्ट लेने के लिये
रोका करतीं थी गाड़ी सडकपर
ठीक से देखकर
जहाँ उनके ऊपर
तेज रोशनी वाला हैलोजन न हो
उनकी इस होशियारी को
बहुत पसन्द करते थे सर जी
और ऊपर लटके बड़े बड़े हैलोजनों को
बहुत नापसन्द किया करतीं थीं मैडम
उनके इलाके का वो छोकरा सभासद
कभी सपने में भी न सोच सके शायद
कि उसे एक वोट कम मिलेगा अगले चुनाव में
बतौर हैलोजन लगवाने की सज़ा


(हमारे एक प्रिय सर जी के रोमांचकारी जीवन का एक पन्ना है ये; सोचने वाली बात है कि पूरी किताब कितनी दिलचस्प न होगी !)  

Saturday, 2 July 2011

जिस काफिर पे दम निकले

है तो इक दोस्त मेरा वो
दुश्मनी का मजा देता है
जान लेता है नजरों से
फिर जीने की दुआ देता है
अपनी पलकों से छूकर
जिस्म को रूह बना देता है
सर्द सी आह सीने में
तबस्सुम से उठा देता है
और फिर दहकते शोले
मेरे होठों पे सजा देता है
छीन लेता है होशोहवास
तोहमत सी लगा देता है
खुशनुमा रातों में अब भी
वो जख्म मजा देता है
है तो इक दोस्त मेरा वो

Saturday, 18 June 2011

हवा का धंधा

हवा खींचते थे भीतर
और कर देते थे बाहर
कभी पेट पिचकावें कभी गाल
सुबह अकेले घर में
कभी साथ साथ पार्कों में
और कभी बड़े जलसों में गांधी मैदानों में
ये धंधा था उनका कुल जमा
सीधा साधा साफ़ सुथरा
सब ठीक ठाक था कि एकदिन
उनने भीतर खींची तो हवा
लेकिन उगलने लगे आग
न जाने क्यों
हो सकता है कि दिमाग में इधर उधर कहीं
गलत जगह घुस गई हो हवा
हवा का क्या है कहीं भी घुस जाती है
खैर जो वो निकली आग तो फ़ैल गई
और जलाने लगी घास और जंगल
भेड़ें हुई परेशान
गडरियों के धंधे में हुआ दखल
उनने उठा लिए डंडे और मचा दिया दंगल
आनन फानन में मामला रफा दफा
अच्छे अच्छों की निकल गई हवा
बोलो सियावर राम चंद्र की ........

Tuesday, 7 June 2011

दशहरी आम

दशहरी अब आम नहीं रहा
गायब है इस दफे
जैसे की खास हो कोई
मिला बड़ी मुश्किल से एक दिन
तो ले आये
दिखता तो था बढ़िया
निकला बड़ा बोगस लेकिन
अगली बार फल वाले से कहा हमने
ऊपर से तो बहुत सही है तुम्हारा आम
लेकिन अंदर से कुछ और ही है भाई
बड़े जोर से हँस के बोला बुढऊ
आमऊ ससुर नेता हुई गए आजकल

Monday, 30 May 2011

हर हाल

हो कोई साथ तो भी
न हो कोई साथ तो भी
पड़ती ही हैं
सलवटें बिस्तर पर

Monday, 23 May 2011

वो दूसरा छोर

सपनो के बंद सुनहरे द्वार
किरणो से ले आशा उधार
तपती रेत पर नन्हीं बूंदे
कहाँ ठिकाना अपना ढूंढें
क्या अपने और क्या बेगाने
सब ने मारे भर भर ताने
भर के छलनी भर के सूप
चुपचाप खिसकती जाती धूप
वो गई आशाओं की पोटली
ये साँझ भी खोखली निकली
जाने कौन सी नादानी में
सूरज डूब मरा पानी में
छोड़ो बीती आगे की सुध लो
रात गहरा रही अब सो लो

Tuesday, 26 April 2011

बोलो विकिलीक्स बाबा की जय!

हर दफ्तर में लूट मची है देश का बज गया बाजा
स्विस बैंको में नोट भर रहे मंत्री हो या राजा
जो कुछ जिसके हाथ लग गया सारा लूट गया
हर नेता और अफसर का अब भांडा फूट गया
बोलो विकिलीक्स बाबा की जय!

पहन के टोपी हाथ जोड़ के घर घर मांगे वोट
हथियाके पावर जनता के पिछवाड़े मारे चोट
ओ भूखे मरने वालों देखो इनको पहचानो
फूल नहीं सर पर इनके अब तो जूते तानो
गांधी के सपनों का भारत तो पीछे छूट गया
हर नेता और अफसर का अब भांडा फूट गया
बोलो विकिलीक्स बाबा की जय!

शर्म नहीं है लाज नहीं है इनका कोई इलाज नहीं है
कैंसर की बीमारी है ये छोटा मोटा खाज नहीं है
देश को अपनी माता कहते नोंच नोंच खाते उसको
गिद्ध जमा हैं संसद में सब देखो चाहे जिसको
सोचो एक कपूत जो अपनी माँ को लूट गया
हर नेता और अफसर का अब भांडा फूट गया
बोलो विकिलीक्स बाबा की जय!

Tuesday, 12 April 2011

जोर से रोओ तो सही

क्या करते हो जब
तुम्हारे हिस्से का
तीन रुपये किलो वाला अनाज
अफसरों की हवस का बन जाता है आहुति
या दुत्कार कर भगा दिए जाते हो उन स्कूलों से
जहाँ तुम्हारे बच्चे की पढ़ाई का बंदोबस्त होना चाहिए
या उन बड़े अस्पतालों के बाहर ही
दम तोड़ देते हैं तुम्हारे बूढ़े माँ बाप और गर्भवती स्त्रियाँ
कभी भी हड़प लिए जाते हैं तुम्हारे जमीन के टुकड़े
नज़रअंदाज कर दिए जाते हैं तुम्हारे जुड़े हुए हाथ
और उनमे दबी अर्जियाँ
बताओ क्या करते हो तुम
मेरी मानो तो
लगा दो आग उन भवनों में
गिरा दो सब ओहदे ऊँचे
नेस्तनाबूत कर दो ये ताज ओ तख़्त
और गर न बन पड़े ये सब
तो रोओ जोर जोर से
बहाओ सैलाब आँसुओं के
चीखो चिल्लाओ गुहार मचा दो
पटक कर सर अपना
लहूलुहान कर दो देहरियां उनकी
यूँ बैठ कोने में सिसक कर
ज़रा ज़रा रोज मर मर के
बदनाम तो न करो
जिंदगी को

Saturday, 9 April 2011

वोटर

कुछ लूटते रहे तुम्हारी इज्जत
छीनते रहे तुम्हारी रोटी
जलाते रहे बस्तियाँ तुम्हारी
और कुछ थे जो
मुद्दा बनाते रहे इन्हें
धंधा चलाते रहे अपना
और भी थे कुछ
जिन्होंने खबरों का लगाया बाज़ार
इन सबके यहाँ रहा नोटों का अम्बार
और तुम
चोरी और बेईमानी का शिकार बनते
मरे लावारिस जानवरों की तरह सड़ते रहे
तुम्हारी रंगो में आखिर बहता क्या है
सुनते थे की हाय लगती है गरीब की
जिसका कोई नहीं उसका खुदा होता है
समझ में नहीं आता किस तरह रोता है तू
और अपने खुदा से रोज तू कहता क्या है
तुम्हारी रंगो में आखिर बहता क्या है

Friday, 8 April 2011

बात बस इतनी सी है

तीर बन लक्ष्य भेद
हुये हर्षित
अहा मै
चूके कभी
भरे विषाद से
अफसोस
रात दिन
सुख दुःख पर झूलते
इतराते बिफराते
आँख होती तो देखते
प्रत्यंचा को
संधान करते हाथों को
होता विवेक तो सोचते
उसके भी पार
और और दूर
जान लेते नियति
समझ लेते विधान
और बस बने रहते
केवल एक तीर
लक्ष्य भेदता
कभी चूकता भी

Saturday, 19 March 2011

पिचकारी

होली की मस्ती छाई है
हर नार लगे भौजाई है
चंहु दिस ढोल मृदंग बजे
बयार फागुनी बौराई है
तरंगित सुर बांसुरी पनघट चौपाल
अठ्खेलियाँ कपोल प्रीत का गुलाल
ढोलकी की थाप पर अकुलाये मन
दहकत रूप बावरी मस्ती गदराये तन
आंगन अंबार टेसू नयन में खुमार है
जोर जबरदस्ती है चिरौरी है मनुहार है
ढलके सीने से स्नेह रंग
तक अंगिया भिगाई है
हर नार लगे भौजाई है
होली की मस्ती छाई है

Thursday, 10 March 2011

हो रहा भारत निर्माण

रोटी के जिन टुकड़ों को
तुम्हारे बदन का खून बनना था
किसी शोख के होठों पर लाली बन
कर रहे हैं
शामे सुहानी उनकी
वो बोतलें दवाओं की
जिनसे बचनी थी जान
नन्हे बच्चे की तुम्हारे
दो एक्स्ट्रा पैग बनकर
सर का दर्द होकर बैठीं हैं
उन साहब का
कपड़े का वो टुकड़ा
जो ढांकने को था इज़्ज़त
तुम्हारी जवान होती बेटी की
टंगा है बन के पर्दा छुपाने को
शायद कुछ घिनौना
सफ़ेद अम्बेसडर में उनकी
जिन लकडियों के टुकडों को
बनके छप्पर रोकना थी बारिश
कि जल सके ठीक से चूल्हा
चटक के जल रही हैं फ़ार्म हाउस के
बोन फायर में उनके
तुमको आज तक तुम्हारे राजा महान
दे सके नहीं रोटी कपड़ा दवा मकान
और कहते हैं कि हो रहा भारत निर्माण