Sunday 3 January 2010

नानी के घर जाने वाली रेलगाड़ी

जल्दी सुबह उठ के पकड़नी होती थी वह गाड़ी
देर रात तक नींद उतरती ही नहीं थी आँखो मे
उत्साह उमंग और व्यग्रता न पूछो
रिक्शे वालों से माँ का मोलभाव सवेरे सवेरे
स्टेशन पर टिकट की लम्बी लाइनें
उस पैसेन्जर का बहुत बहुत लेट होते जाना
और फ़िर किसी देवदूत की तरह
आते इंजन की रोमांचकारी झलक
डब्बे मे जल्दी दौड़ के
लकड़ी के फ़ट्टों वाली सीटें घेर लेना
जितनी हो सकें
जो बाद में धीरे धीरे और चढ़ते मुसाफ़िर
ज़रा ज़रा करके हड़प कर जाने वाले होते
जगह जगह रुकती गाड़ी
धुँये के बादल उड़ाता इंजन
सीटी और चना जोर की आवाजें
पान चबाते यहाँ वहाँ बेवजह घूमते
हँसी ठट्ठा करते शोहदे
मूँगफ़ली चबाकर छिलके वहीं फ़ेंकते लोग
बार बार खाने को माँगते
बेवजह रोते चीखते बच्चे
फ़िर पीटे जाते
ऊपर की सीटों पर धँसे घुसे
बाज़ी बिछाये दहला पकड़ खेलते नौजवान
स्टेशनों के आस पास
लाइनों के किनारे की दिवारों पर
मर्दाना कमजोरी का शर्तिया इलाज
दाद खाज़ खुजली का मलहम
शौचालयों में पानी हो न हो
अश्लील भित्ति चित्र कलाकारी जरूर होती
ज़ंजीर खींच गाड़ी रोक अपने गाँव के पास
कूदकर भागते दस बारह लड़के
लौटते होते जो पास वाले कस्बे से
रेलवे भरती परीक्षा दे के
खाना वो पूड़ी आलू
दादी के आम के अचार के साथ
गजक लईया पट्टी और केले
कम कम पीना पानी
और फ़िर हर स्टेशन पर
बोतल फ़िर से भरने की कोशिश
अक्सर नाकाम होती हुई
देर शाम तक कई घन्टों
और बहुत थोड़े किलोमीटरों का
सफ़र हो ही जाता तय
धूल धुँये और कोयले के टुकड़ों से लथपथ
प्यासे और भूखे
थके और झोलों से लदे फ़ंदे
उमंग और खुशी से भरे ताजे ताजे से
पहुँच जाते नानी के घर
कहाँ वो शानदार और हसीन यात्रायें
और कहाँ ये
एअर कन्डीशन्ड मे बैठे ही उपलब्ध
वाटर बाटल टी काफ़ी लन्च और न जाने क्या क्या
सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र
महज चन्द घन्टों मे तय करती
बोरिंग राजधानियाँ और शताब्दियाँ

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