Monday 4 January 2010

बेटी बचाओ; किसलिए?

मेरी बच्ची!
तुम्हे खेलने जाने दूँ तो कैसे
जानता हूँ जरूरी है तुम्हारा खेलना
मगर ज्यादा जरूरी है तुम्हारी आबरू
ज्यादा जरूरी है कि तुम
इतनी नफ़रत से न भर जाओ
कि फ़िर जी ही न सको
मेरी बच्ची!
तुम्हे चाहिये शिक्षा
जानता हूँ मगर
आचार्यों और प्राचार्यों के
कुत्सित इरादों के समाचार
कँपा देते हैं छाती मेरी
मेरी बच्ची!
तुम मत पड़ना बीमार
नहीं कर सकूँगा भरोसा
चिकित्सकों की शक्ल में भेड़ियों पर
मेरी बच्ची!
नहीं तुम नहीं कर सकतीं अपना मनोरंजन
कोई सिनेमा नहीं तुम्हारे लिये
कहीं घूमना फ़िरना नहीं दोस्तों के संग
सड़कों पर तुम्हारी ताक में
लगाये हैं घात दोपाये जानवर
मेरी बच्ची!
मै आशंकित हूँ
इस तरह जीकर तुम आखिर
बनोगी क्या
करोगी क्या
कैसे कटेगी तुम्हारी ज़िन्दगी
कन्या भ्रूण हत्या अपराध है
जानता हूँ
अब लगता है अपराध
तुम्हे जीवन देना भी
मैं नहीं जानता कि
कौन सा अपराध ज्यादा बड़ा है
लेकिन हर हाल में
मै क्षमा प्रार्थी हूँ तुमसे
मेरी बच्ची!

1 comment:

  1. कितनी अजीब बात है कि जिस तरह कि रचनाये सम्मानित होनी चाहिए उस रचना पर 4 जनवरी 2010 से किसी ने एक प्रतिक्रिया तक देना उचित नहीं समझा आदरणीय कृपया कर के एक साझा ब्लॉग: एक प्रयास "बेटियां बचाने का": में आपका एक लेखक व् मार्गदर्शक के रूप में स्वागत है किसके लिए आमंत्रण आपके इ मेल के पते पर भेजा जा रहा है जिसे स्वीकार करे व इस साहित्य यज्ञ ( एक प्रयास "बेटियां बचाने का")में अपने सहयोग रूपी आहुतियाँ डालने की कृपा करे इस रचना को भी जल्द से जल्द इस ब्लॉग पर प्रकाशित करे

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