Friday, 29 January, 2010

सम्बन्ध

रात दिखता था घर के बाहर
घना कोहरा
इतना कि नहीं दिखता था
सामने वाला घर
सोचता हूँ
वो कौन सा कोहरा है
सरक आया है जो भीतर घर के
नहीं दिखते साफ़
साथ रहने वाले शख्स
कहाँ देख पाते हैं साफ़ हम
बरसों साथ रहके भी
एक दूसरे को
क्या है हमारे बीच कोहरा सा
जो दिखता नहीं
देखने देता नहीं
वो मैं है शायद
दो मैं
एक मेरा एक तुम्हारा
दो अहम
ठोस
सोचना ये है कि
हमारे बीच वो ऊष्मा कहाँ से आये
जो वाष्पीभूत कर दे
बीच के कोहरे को
शायद प्रेम है वो गर्मी

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